725/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
चूड़ियाँ नारी-जीवन का अद्भुत शृंगार है।उसके सोलह शृंगारों में उसकी अनुपम बहार है।यद्यपि नए फैशन ने कितने ही करवट लिए हों,किंतु चूड़ियों के घनत्व में कोई ह्रास नहीं हुआ।वह नारी मात्र के लिए एक स्वाभाविक उल्लास है। चूड़ी के संसार में उसका जो भी इतिहास रहा हो,किंतु वह उज्ज्वल इतिहास है।जब चूड़ियों के अतीत की ओर दृष्टिपात करते हैं,तो पाते हैं कि चूड़ियाँ हजारों वर्ष पहले से नारी जीवन में पदार्पण कर चुकी थीं।मोहजोदड़ो की खुदाई में इनका अस्तित्व 2600 ईसा पूर्व से मिलता है।वहाँ ये एक नृत्यांगना की प्रतिमा की कलाइयों की शोभा बढ़ाती हुई दिखाई देती हैं।जो सीप ताँबा और स्वर्ण जैसी धातु से बनी हुई पाई गई हैं।चूड़ियाँ भारत के सांस्कृतिक और वैवाहिक जीवन का मुख्य भाग हैं।समय के साथ-साथ चूड़ियों ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, जो कालांतर में लाख,काँच, पीतल,स्टील और प्लास्टिक की बनने लगी हैं।
लाख और काँच की चूड़ियों के लिए उत्तर प्रदेश का फिरोजाबाद शहर विश्व प्रसिद्ध है। जहाँ शहर के बड़े-बड़े कारखानों के अतिरिक्त अनेक घरों में चूड़ी सम्बन्धी अनेक छोटे -छोटे कार्य होते हैं और लोगों को रोजगार मिलता है। विश्व की प्रारंभिक सभ्यताओं में चूड़ियों का विशेष महत्त्व रहा है। कहा जाता है कि 7000 ईसा पूर्व मेहरगढ़ की खुदाई में चूड़ियाँ पहने महिलाओं की मूर्तियाँ मिली हैं।अति प्राचीन काल में चूड़ियाँ ताँबे,कांसे,सोने,गोमेद,समुद्री सीपियों और सुलेमानी पत्थरों से बनाई जाती थीं। 322 से 185 ईसा पूर्व मौर्य साम्रज्य में भी सोने आदि सामग्री से बनी हुई पाई जाती थीं। रोमन और मध्य पूर्वी उद्योगों की पहल के परिणामस्वरूप काँच से बनी हुई चूड़ियाँ अस्तित्व में आईं। जो सोलहवीं शताब्दी तक भारत में शृंगार का एक अभिन्न अंग बनकर उभरीं हैं।
चूड़ियाँ अपनी नाजुकी और रंगीनियों में नारीवादी हैं,इसलिए वे नारियों की कलाइयों के शृंगार का अहम हिस्सा भी हैं। जब चूड़ियों ने देखा कि वे जब सुहागनों के शृंगार का प्रतीक हैं तो वे ही कुँवारी क्यों रहें ,इसलिए उन्होंने शादी कर डाली और कड़े के गले में वरमाला पहनाई।कड़ा उनका दूल्हा बन गया। इसलिए तो एक या दो कड़े दर्जन भर चूड़ियों की लड़ी पर भारी पड़ते हैं। कड़ा तो कड़ा ही है , वह कमजोर और नाजुक कैसे हो सकता है भला ,मर्द होने की वजह से कुछ मर्द भी चूड़ी न पहन कर कड़ा पहनने लगे ।वैसे भी चूड़ी नारीत्व और कोमलता का प्रतीक मानी गई। तभी तो यदि किसी पुरुष को गाली दी गई तो यही कहा गया कि जा जा चूड़ियाँ पहन लें और घर के अंदर बैठ जा। मर्द है तो बाहर आ। आदि आदि चूड़ी संज्ञक शब्द बाणों से उसे तिरस्कृत और अपमानित किया गया।
हिन्दू विवाह में दुलहिन को प्रायः हरी - हरी चूड़ियाँ सौभाग्य के प्रतीक के रूप में अवश्य पहनाई जाती हैं। किसी किसी जाति में विवाह में दुलहिन को काली चूड़ियाँ पहनाए जाने की परम्परा है। ऐसा पीलीभीत जिले में कायस्थ परिवारों में लेखक को देखने को मिला। वह घर, घर ही क्या जिसमें चूड़ियों की खनक और पायलों की झनक न हो। किसी स्त्री के वैधव्य पर उसकी वे सुहाग की प्रतीक चूड़ियाँ भंग कर दिए जाने की परंपरा है। सुहाग की बिंदी की तरह चूड़ियों का नारी जीवन में विशेष महत्त्व है। एक समय था ,जब पत्नी अपने पति को अपने आगमन या उसको जगाने के लिए अपनी चूड़ियाँ खनका देती थी , यह एक प्रकार का आमंत्रण संकेत भी माना गया,क्योंकि नारी स्वभावतः लज्जाशील है,वह खुलकर कुछ नहीं कह पा रही ;इसलिए चूड़ियों की खनक से बहुत कुछ मनोभाव व्यक्त कर देती है।आज के अत्याधुनिक नारी जीवन से ये सांकेतिक नारी सुलभ संकेत विदा होते जा रहे हैं,इसलिए अब व्यंजनाएँ मिट रही हैं और अभिधाएँ अस्तित्व में आकर गुड़ गोबर कर रही हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो पहले की नारी अधिक बुद्धिमती और लज्जाशीला थी ,अब वही लज्जाशीलता अब उच्छऋंखलता में बदलती जा रही हैं।अब चूड़ियों की जगह कड़े जो पहने जाने लगे हैं,इसलिए नारी की सहज नाजुकी मरने लगी है। चूड़ियाँ कड़ों में अकड़ने लगी हैं ,इसलिए वे व्यंजित नहीं करतीं ,खड़कने लगी हैं। अब खनक खड़क में बदल गई हैं। चूड़ियाँ, चूड़ियाँ न रहीं, वे चूड़ा हो गईं, कड़ा हो गईं। आप जानते हैं कि कड़ा तो कड़ा है ,वह अकड़ा ही रहेगा ,कड़ा ही रहेगा ,उसमें कोमलता कहाँ ,विनम्रता कहाँ ? चूड़ी इतिहास करवट ले चुका है। अब वह करवट लेकर किधर जाएगा ,यह तो समय की चाल ही बताएगी। बहरहाल चूड़ी के हालात अच्छे नहीं हैं । अब वह काँच से धात्विक होकर कठोर हृदय हो गई है। अब चूड़ी फिरोजाबाद के बाज़ार में जितनी खनकनी है ,खनक ले ;घर की देहरी के भीतर तो कड़े से बड़े-बड़े झगड़े करने लगी है।
नारी के अन्य शृंगार साधनों की तरह चूड़ी भी करवट बदल कर अत्याधुनिक होती जा रही है। नारी की स्वाभाविक कोमलता- हनन के साथ चूड़ी की प्रतीकात्मकता का ह्रास हो रहा है। अत्याधुनिकाओं ने तो चूड़ी से मुक्ति पाने की ओर कदम बढ़ा ही दिया है। वह उनके कार्य की बाधा है। पुरुष वर्ग के कार्य अपनाने के बाद तो यह बाधा आनी ही थी,वह आ रही है।कहीं वह बस ड्राइव कर रही है तो कहीं लोको पायलट बन ट्रेन और मालगाड़ियों को दौड़ा रही है। कहीं फाइटर और जेट विमान उसके हाथों में चूड़ियाँ पहनने से रोक रहे हैं, समय की माँग ही ऐसी है,कि चूड़ी का इतिहास बदलाव की ओर अग्रसर हो चुका है। समय की गति हमारे आपके चाहने से बदली नहीं जा सकती। उसे तो स्व गति से अग्रसर होना ही होगा। फिर भी चूड़ी जिंदा है और जिंदा रहेगी।
शुभमस्तु !
10.12.2025●12.15 आ०मा०(रात्रि)
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