789/2025
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डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दुनिया शुभ- लाभ के चक्कर में उमड़-घुमड़ रही है। सब यही चाहते हैं कि उसको लाभ ही लाभ हो।वह लाभ की सुलभता चाहे जैसे भी हो,पर हो अवश्य। इसी एक मूल सूत्र पर सभी चकरघिन्नी बने हुए हैं। अपना शुभत्व पाने के चक्कर में स्त्री -पुरुषों ने अपनी नैतिकता और चरित्र को भी तिलांजलि दे दी है।स्वलाभत्व के लिए चाहे जितना भी नीचे गिरना पड़े अथवा चाहे जितना ऊपर उठना पड़े;उसे कोई आपत्ति नहीं , कोई शंका नहीं। वह डंके की चोट पर मात्र अपना ही लाभ चाहता/चाहती है। इसके लिए भले ही किसी को राह चलते हुए गिराना पड़े,उसमें टंगड़ी मारनी पड़े, उसे कोई आपत्ति नहीं;बस उसका अपना लाभ होना चाहिए और प्रत्येक स्तर पर होना चाहिए। जब कि वह भी जानता है कि यह लाभ उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज है। 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।'जब सब कुछ विधि के हाथों का किया कराया फल है ,तो निश्चिंत होकर क्यों नहीं रहता। प्रत्येक आदमी और स्त्री अपने उसी लाभ के हितार्थ सही गलत करने में नहीं चूकता। इस लाभत्व प्राप्ति के झूठ,चोरी,गबन, मिलावट, घटतोली,कमनापी,बेईमानी,छल, छद्म,सत्यासत्य : सभी कुछ का आश्रय लेता है।अपने चरित्र से नीचे पतित भी होता है।
जीवन के साथ और जीवन के बाद भी मन और आत्मा के जिस आंतरिक भाव की मानव मात्र को सबसे अधिक और सबसे वृहद मात्रा में आवश्यकता है वह लाभ नहीं। हर आदमी अपने चरित्र और कर्म से बनिया बन गया है। बस शुभ लाभ ही उसे चाहिए,चाहे उसे सारी रात बिस्तर में पड़े -पड़े करवटें बदलते हुए ही क्यों न काटनी पड़ें। इसके लिए वह सहर्ष तैयार है,किन्तु मानव जीवन का वह भाव जो उसके लिए सदैव अनिवार्य है;उसके विषय में सोचने के लिए उसको अवकाश ही नहीं। वह आंतरिक भाव एक ऐसी स्थिति है, जिसकी चाहना प्रत्येक व्यक्ति दूसरे/दूसरों के लिए तो करता है,किन्तु अपने लिए नहीं। इसीलिए किसी के इस नश्वर शरीर को छोड़ने के बाद यही कामना की जाती है कि परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करे। आदमी यह भी अच्छी तरह से जानता है कि जिस तरह से उसे अब तक शांति नहीं मिली,उसे भी कहाँ मिली होगी ; वह भी उसी की तरह तीन दो पाँच करते हुए नौ दो ग्यारह हो लिया। जब वही शांत नहीं ,तो जाने वाला भी क्यों शांति को प्राप्त कर पाया होगा !
यह शांति ही जीवन का वह आंतरिक आत्मिक भाव है,जिसकी उसे परम आवश्यकता है ,परम आवश्यकता थी और रहेगी भी। जब कहीं घर या बाहर झगड़ा या विवाद हो जाता है तो सब लोग उन्हें शांत रहने और झगड़े को शांत करने का सुझाव देते हैं। कोई यह नहीं कहता अथवा चाहता कि लड़ते रहो। यह शांति ही अंतिम तत्त्व है,जिसकी परम आवश्यकता है।इसलिए ॐ शांति कहकर या लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। अब यह अलग बात है कि जाने वाले को यह शांति मिलती या नहीं, यह तो उसके विगत जीवन के कृत कर्मों की फलश्रुति पर ही निर्भर करता है ।इसके मूल में यह भाव भी छिपा हुआ है कि हमारी तरह उसे जीवन भर शांति नहीं मिली,हे भगवान अब तो उसे शांति मिल जाए। यह केवल एक कामना मात्र है। यदि हमारे चाहने से ही सबको शांति मिल जाए तो रूस और यूक्रेन कब के शांति लाभ ले लेते ! उन्हें लड़ना है ,तो वे लड़ेंगे ही। आप और हम कितना ही चाह लें ,पर वह हमारी वह चाहना कितनी कारगर होगी ,कहा नहीं जा सकता। हमारी चाहना में यदि इतना ही वजन होता तो दुनिया के अंर्तराष्ट्रीय मसले हल करने के लिए हमें ही बुलाया जाता और कहा जाता कि चलो भाई थोड़ा चाह लो कि लड़ाई शांत हो जाए। पर हमारे चाहने से कभी कुछ हुआ है और न होने वाला है। चाह लो, चाहने से भला किसने रोका है। चाहना में कुछ खर्चा भी नहीं होता। यदि घर की हर्रा फिटकरी भी लगानी पड़ती तो इस चाहना की कीमत मालूम हो जाती है। यह चाहना तो फ्री की है,निःशुल्क है, निर्मूल्य है,बिना पैसे की है,इसलिए चाहे जितनी लुटा लो। कभी-कभी इसका उलटा भी होता है। वह यही कि बाहर से तो आदमी कहता है कि लड़ाई लड़ाई बन्द करो, और अंदर से सोचता है नहीं मानते तो लड़ मरो। हमारा क्या !हमें क्या।हमें तो कहना था,सो कह दिया। अब चाहे एक दूसरे को खोद कर गाड़ भी दो तो हमें क्या ! बस इस द्विविधा पूर्ण भाव से ही लड़ाई शांत नहीं होती। क्योंकि हम ही जब सच्चे मन और अंतरात्मा से नहीं चाहते,तो हमारा मनचाहा हो भी कैसे सकता है।
'शांति' का विलोम भाव 'अशांति' है।इसी अशांति का ही सर्वत्र साम्राज्य है। पत्नी पति से संतुष्ट नहीं , पति पत्नी से संतुष्ट नहीं,इसलिए शांति कायम होगी भी तो कैसे ! पड़ौसी अपने पड़ोसी से असंतुष्ट है तो शांति का काम ही क्या रहा ! बॉस कर्मचारी परस्पर असंतुष्ट हैं ,तो शांति हो भी क्यों कर भला ! जनता नेता से प्रसन्न नहीं ,तो क्या देश में शांति कायम हो सकती है ? विद्यार्थी अपने विद्यालय के तंत्र और उनके शिक्षण से संतुष्ट नहीं, तब तो अशांति बने रहना एक अनिवार्य सत्य है। मजदूर अपने मालिक या ठेकेदार से खुश नहीं ,तो अशांति कायम रहना अनिवार्य ही है। पाकिस्तान भारत से,ट्रम्प पूरी दुनिया से, रूस यूक्रेन से संतुष्ट क्यों होने लगे ;तब तो अशान्ति का झंडा फहराना भी जरूरी हो ही जाता है।
कुल मिलाकर पूरी दुनिया को ॐ शांति का अनिवार्य सत्य मिलना ही चाहिए। सब अपना- अपना कर और खा रहे हैं,फिर भी अशान्त हैं। तो कोई कर भी क्या सकता है। मैं तो कहता हूँ कि कोई किसी के चाहने मात्र से शांति ग्रहण नहीं कर सकता। यह शांति तो दोनों पक्षों अथवा हमारे अपने अंतर्मन से ही मिलने वाली है। यह कोई बाहरी और कृत्रिम वस्तु नहीं जो भावना मात्र में भरी हुई हो कि इसने चाहा और उसे मिल गई। न पहाड़ शांत है और न नदी या सिंधु ही, फिर इस आदमी से ही शांति की उम्मीद क्यों की जाए ? उसके अंदर तो कितनी नदियां बाँधों को तोड़ रही हैं,कितने महासागर उमड़ रहे हैं,कितने पर्वत मचल रहे हैं,कितने प्रभंजन गरज रहे हैं,किंतने ज्वालामुखी धधक रहे हैं।वहाँ यह शांति नाम की चिड़िया पर भी कैसे मार सकती है। उसे तो अशांत ही रहना है। अब उसके विदा होने के बाद करते रहिए कामना ,चाहना ,भावना कि परमात्मा उसकी आत्मा को शांति प्रदान करे। अब वह करे या न करे ;यह बात तो परमात्मा ही जाने कि वह क्यों प्रदान नहीं कर रहा है अथवा वह आत्मा ही अशांत रहने से मुक्ति की आकांक्षी नहीं है। शांति भी कर्मधारित है। जैसा कर्म वैसी शांति ,अन्यथा भ्रांति ही भ्रांति! क्लांति ही क्लांति ! म्लानता ही म्लानता ! कहाँ है शांतता !
शांति की तलाश में लोग घर बार छोड़ते हैं। सन्यासी बनते हैं। गेरुआ पहनते हैं। नागा बाबा बनते हैं। श्मशान के अघोरी बनते हैं ;किन्तु क्या कोई बता सकता है कि उन्हें 'शांति ' मिली ?जिसकी तलाश में उन्होंने एक सहज और स्वाभाविक जीवन पथ छोड़ कर बनावटी जीवन पथ को अंगीकार किया! यह कोई नहीं बता सकता। वह शांति न तो महलों में है और न कुटिया में है। वह तो मन के उस एकांत कोने में है, जो सबको सुलभ है। पर आदमी उसे धन,दौलत, घर,मकान,कार,बंगला, कोठी,कनक ,व्यवसाय,कामिनी और काम में तलाशता फिरता है। इनमें से वह कहीं भी नहीं है। त्याग और तपस्या में भी वह सहज सुलभ नहीं है। और यदि है तो नमक प्याज के साथ सूखी रोटी में भी है और यदि नहीं है तो सोने का निवाला खाने वाले के कनक थाल में भी नहीं है।
शुभमस्तु !
28.12.2025●8.00आ०मा०
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