मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

उलझा है भारत नारों में [ गीतिका ]

 720/2025

       

   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उलझा      है     भारत     नारों   में।

नेताजी       बैठे        कारों      में।।


सोचते      नहीं  वे    हो    विकास,

वे  फँसे  हुए     नित   हारों     में।


जैसे     भी    मिले     मात्र   सत्ता,

वे     खेल      रहे  हैं    तारों     में।


अब  युवा  आज  का  भटक  रहा,

मन  बुद्धि  लगी  सब   यारों    में।


बागों  में     कैसे     खिलें    फूल,

फुलवारी    भटकी     खारों    में।


निज  पति  से जिनको  प्यार नहीं,

ललनाएँ       उलझीं   जारों    में।


अब  'शुभम्'  देश  का  होगा क्या,

जन- जन   डूबा   अँधियारों    में।


शुभमस्तु !


08.12.2025●8.30आ०मा०

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