मंगलवार, 10 जून 2025

पर्यावरण की चिंता [ अतुकांतिका ]

 252/2025

               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लगा गालियों का धुँआर

पर्यावरण की चिंता है,

सूख रहे हैं बेचारे 

पेड़ रोपने के लिए

स्वयं काटते-

कटवाते

दूसरों से अपेक्षा है।


पौधा लगाया,

मुस्कराए,

फोटो भी खिंचवाया,

अखबार में छपाया,

पर अगले दिन

बकरी चर गई,

ऐसी ही है आज

पर्यावरण रक्षा ।


पौधा लगाया,

पानी कौन दे?

देखभाल कौन करे?

निराई गुड़ाई

ट्री गार्ड की गड़ाई

कोई और कर ले,

उनका लक्ष्य पूरा हुआ।


उपदेशों का शर्बत

ज्ञान का जलजीरा

हर नुक्कड़ पर तैयार है,

जितना चाहो पीओ

कोई शुल्क नहीं।


तपती हुई जेठ की धरती

वे पौधे रोपे जा रहे हैं

रहें तो रहें

मरें तो मर जाएँ ,

उनका उद्देश्य पूरा हुआ

अखबार में नाम सहित

फोटो भी छप ही गया,

यही देशभक्ति है।


शुभमस्तु !


05.06.2025●1.000प0मा0

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