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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
काव्य- सुधा का जो रस पीता।
दीर्घ आयु का जीवन जीता।।
काव्य-साधना सरल नहीं है ।
विरलों में कवि एक कहीं है।।
शब्द - साधना का तपसी जो।
करता है माँ की भगती को।।
भक्ति - सुधा की अविरत गंगा।
करती है तन-मन को चंगा।।
कर्म - सुधा से अमर बनाएँ।
उच्च शिखर का पथ चमकाएं।।
हीन कर्म में जीवन बीते।
रहते नर रीते के रीते।।
मधुर वचन की बोली वाणी।
सुधा समान बने कल्याणी।।
रसना सुधा वही विष बेली।
नष्ट कर रही जगत अकेली।।
सुधा सदृश गंगा का पानी।
अघ - ओघों की आग नसानी।।
जीव-जंतु जो प्यासे होते।
सुधा - बिंदु पीते अघ खोते।।
स्रोत सुधा का सोम हमारा।
ओस रूप में झरता प्यारा।।
खग चकोर सम्मोहित भारी।
किरण सुधा की चाहे प्यारी।।
'शुभम्' सुधा है दुर्लभ भारी।
दानव चाहें अति आचारी।।
पुण्य - प्रताप सुधा का दाता।
वही ध्वजा गिरि पर लहराता।।
शुभमस्तु !
28.09.2025●9.00प०मा०
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