शनिवार, 27 सितंबर 2025

ढूँढ़ने का शौक मुझको! [ नवगीत ]

 592/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी में 

आदमी को

ढूँढ़ने का शौक मुझको।


देह से सब

एक जैसे

किंतु भीतर भेड़िया है

जीभ में रस

नींव में विष

आदमी  आहेरिया  है

धत्तूर के 

हर फूल को भी

सूँघने का शौक मुझको।


एक ही

दर से निकलते

कौन छोटा या बड़ा है

जो करे 

कुछ कर्म ऊँचा

कनक का बनता घड़ा है

पीत पीतल

सौर सोना

जाँचने का शौक मुझको।


तीन गज की

इस जमीं  में

है जरूरत मात्र सबको

अभिजात्यता में

ऐंठता क्यों

भूल जाता  ईश - रब को

शब्द के

हर नाद को

है श्रवण का शौक मुझको।


शुभमस्तु !


27.09.2025● 1.15 प०मा०

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