रविवार, 21 सितंबर 2025

कविता मय संसार है [ दोहा ]

 573/2025


         

     [ छंद,दोहे,गीत,भजन,कविता]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक

गणना       मात्राभार    से, सजता  छंद    विधान।

वर्ण  भार    का   ज्ञान   हो, कविता   बने महान।।

लय यति गति प्रति शब्द की,नियमित हो तब छंद।

बनता    है   निर्दोष    ही,  कविता   दे      आनंद।।


 तुलसीदास   कबीर  ने, लिख-लिख दोहे   छंद।

नीति  ज्ञान   वर्षण   किया,  चहुँदिशि परमानंद।।

नीतिपरक  दोहे   लिखे,  कविवर  विमल  रहीम।

लिखते   हैं   वे  सत्य   ही,  मधुर  कहें  या  नीम।।


विविध   रूप    हैं गीत के, लोक श्रमिक  संसार।

लिखते  कवि  नवगीत भी, जिनका नवल प्रकार।।

गंगा    में     नव गीत  की,  नहा रहे  कवि   वृंद।

पग- पग    बदलें  छंद वे,   बरस  रहा   आनंद।।


भक्त   भजन  में  लीन  हैं,प्रभु आराधन   लीन।

भूल   गए    संसार  को,देह  न यद्यपि   पीन।।

भजन   गान   करता  रहा,भक्त एक दिन-रात।

सदा  जागरण    ही  करे,  संध्या  या कि प्रभात।।


कवि  जो  प्रतिभावान है,कविता करे अबाध।

अविरत  है  यह  साधना,मन को अपने साध।।

कविता  है  साहित्य का, एक सरस  भुव  रूप।

अनुरंजित   मन   को   करे, भरती भाव अनूप।।


                   एक में सब

गीत  भजन  दोहे  सभी,विविध छंद  के  रूप।

कविता  मय   संसार   में, मधु रस   भरे अपूप।।


शुभमस्तु !


20.09.2025●9.00प०मा०

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