571/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जो होता है
हो जाने दो
सबकी अपनी मनमानी है।
नेता भगवान
हुआ है अब
पीछे-पीछे चलती जनता
अब बिना
चढ़ावे नेता को
जनता का काम नहीं बनता
विद्वता साधुता
मात्र वहीं
नैया जो पार लगानी है।
अब उठा जनाजा
शिक्षा का
अब भैंस बना काला अक्षर
सब गिद्ध चील
हैं संसद में
गुर्गे भी बने हुए मच्छर
अब समाधान
तो सपना है
हर बात खूब उलझानी है ।
इन भगवानों के हाथ
देश का
होना बंटाढार बड़ा
अंधा बहरा
भगवान हुआ
भरता है अपना रोज घड़ा
उसका क्या
होगा हाल 'शुभम्'
लाचार देश का प्रानी है।
शुभमस्तु !
20.09.2025● 4.15प०
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