585/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कंकरीट के
जंगल में कुछ
दोपायों की होती हलचल।
नहीं समझते
आम स्वयं को
पैसे ने अभिजात्य बनाया
भुनगा लगता
सड़कों पर जो
बीस मंजिला भवन चुनाया
सूट बूट में
महक रहे जो
लगती बुरी हवाई चप्पल।
हाल हवाई
चाल चुराई
सूखी लकड़ी-से ऐंठे वे
लगते नहीं
कहीं से मानव
बालकनी में हैं बैठे वे
सन्नाटा
नीचे से ऊपर
भरा हुआ ज्यों कोई दलदल।
आँखों पर
ऐनक है काली
नहीं दिखाई देता मानव
लतियाते हैं
मजदूरों को
लगता है जैसे हों दानव
चार हाथ की
दुनिया उनकी
दसवीं मंजिल पर है खल-खल।
शुभमस्तु !
25.09.2025●1.15 प०मा०
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