586/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आदमी में
अदमीपन की
महक कैसे मिलेगी।
ढंग बदले
रंग बदले
वे तरंगें भी नहीं हैं
नाम बदले
काम बदले
आचरण वैसे कहीं हैं!
सादगी में
सदगीपन की
चमक कैसे मिलेगी।
चेहरे हैं
या मुखौटे
जान पाया मैं न अंतर
श्वान दल में
भेड़िए हैं
फाँदते लंगूर बंदर
नीतियों में
नीतिपन की
चहक कैसे मिलेगी !
चाँद पर
अपने कदम रख
नर मशीनी हो गया है
आदमी से
काम ही क्या
शेष कोई रह गया है
कौन रावण
राम किसमें
धमक कैसे मिलेगी!
शुभमस्तु !
25.09.2025● 2.15 प०मा०
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