सोमवार, 29 सितंबर 2025

संविधान के दुश्मन [ नवगीत ]

 594/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संविधान के

दुश्मन

टसुए बहा रहे हैं।


नहीं  चाहते

कोई 

उनसे   आगे  जाए

रक्त चूसना

उनका

उनको बेशक भाए

सरकारों के

पुतले

पथ पर दहा रहे हैं।


चुम्बन चरण

चाहते अपना

हर उस जन से

जो पिछड़ा है

दीन-हीन है

निज बचपन से

धनिकों को

केवल 

धनुए वे सुहा रहे हैं।


समतावादी

केवल नारा

भाषण तक है

भीतर से

वह खरा खोखला

अब भौंचक है

पर्दे में 

गोमांस महकता

मंत्र गूँजते नहा रहे हैं।


शुभमस्तु !


27.09.2025●10.00 प०मा०

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