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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
व्यक्ति नियम से नित्य,करता है अभ्यास जो।
बने वही आदित्य, अंबर में चमके सदा।।
बनता श्रेष्ठ सुजान,जड़ कर ले अभ्यास तो।
सिल पर बनें निशान,रगड़-रगड़ रस्सी चले।।
भर देता नवरंग,नित्य नियम अभ्यास का।
अगणित सभी विहंग,ज्यों उड़ते हैं शून्य में।।
नित्य किया अभ्यास,ऋषि-मुनियों ने योग का।
जगत करे आभास, बने महाज्ञानी वही।।
यदि करते अभ्यास,पढ़ते विद्या छात्र जो।
न हो जगत उपहास, बनते हैं विद्वान वे।।
कवि करता अभ्यास,कविता के बहु छंद हैं।
सबको आए रास,छंद -विज्ञ बनता वही।।
अनथक रुके न राह,पद से पद कहता यही।
करता वाहो - वाह, चलने का अभ्यास ये।।
करते नित्य प्रयास,मंजिल भी उनको मिली।
त्याग दिया अभ्यास,बैठे जो द्रुम छाँव में।।
वही प्रगति का मूल, संस्कार अभ्यास है।
पाती सागर कूल, सरिता जो चलती रहे।।
थम जाना है मौत, सार यही अभ्यास का।
चमक उठे कलधौत,अपनी गति चलता रहे।।
बनें सुविज्ञ सुजान,आओ हम अभ्यास से।
पथ को कभी महान,नहीं अधूरा छोड़ते।।
शुभमस्तु !
18.09.2025●10.00आ०मा०
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