577/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मनवाने को
रूठ गए वे
अपनों से।
पता उन्हें है
कोई
नाज उठाएगा
पूछेगा
क्यों कर रूठे
समझाएगा
कौन भला
रूठा करता है
सपनों से।
जिसका
कोई नहीं
रूठना क्या जाने
जान रहा वह
नहीं
गीत लोरी आने
चने चबा दे जिनको
उनके
टखनों से।
वनवासी
कोई कब
किससे रूठा है
मिले
निदर्शन एक
वस्तुतः झूठा है
झुकता कोई
लाड़ प्यार के
वजनों से।
शुभमस्तु !
22.09.2025●5.30प०मा०
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