588/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
करना गुरुओं का नहीं,कभी मित्र उपहास।
छिपा वहाँ अपमान है,हरता हृदय-उजास।।
हरता हृदय-उजास, मान के वे अधिकारी।
शिष्य सदा ही दास,और तुम रहो पुजारी।।
'शुभम्' आग समरूप,हवा मत ऐसी भरना।
करना सदा प्रयास, मान गुरुवर का करना।।
-2-
करता है उपहास जो, होता है बदनाम।
शुद्ध नहीं जब भावना,ज्वलित हृदय का काम।।
ज्वलित हृदय का काम, सुयोधन ने यह झेला।
हुआ महासंग्राम, शवों का चलता रेला।।
'शुभम्' चुभे कटु शब्द,द्रौपदी के क्या मरता?
अंधों के ही अंध,बाण उर में निज करता।।
-3-
वाणी ऐसी बोलिए, उर में करे उजास।
लेशमात्र करना नहीं, धूल भरे उपहास।।
धूल भरे उपहास, शहद वाणी में घोलें।
कहने से पल पूर्व, तुला पर खुद की तोलें।।
'शुभम्' न कटुता पूर्ण, नहीं वाणी कल्याणी।
भले सत्य हो तथ्य, बोलना मधुरिम वाणी।।
-4-
रसना में ही स्वर्ग है, रसना नरक निवास।
मान मिले सम्मान भी, करे वही उपहास।।
करे वही उपहास, प्रेम की गंगा ऐसी।
संभव हों सब काम,सफलता मिलती वैसी।।
'शुभम्' कभी भी मित्र, नहीं रसना से डसना।
अहि का यही चरित्र, मधुर ही रखना रसना।।
-5-
होता है उपहास तो, भूल न पाए मित्र।
उपहासी उपहास से, विकृत करे चरित्र।।
विकृत करे चरित्र, आग की दे चिनगारी।
सुलग उठे फिर इत्र, शेष फिर रहे उधारी।।
'शुभम्' मिले उपहास, हृदय फिर ऐसा रोता।
बनता कटु इतिहास,नहीं फिर वह दिन होता।।
शुभमस्तु !
25.09.2025●9.15प०मा०
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