562/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सजती हूँ
नित्य सँवरती हूँ
संतुष्ट कभी क्या होती हूँ?
उनसे पूछा
लगती कैसी
वे बोले जैसे हूर कोई
विश्वास नहीं
उनका आया
खुद लगती हूँ अमचूर कोई
ये क्रीम लिपस्टिक
रूज़ सभी
भर-भर अलमारी सोती हूँ।
उनसे बेहतर
मेरी साड़ी
क्या खूब कँटीले नैना हैं
स्पंजी
भरी-भरी देही
मरदों की मारक सेना हैं
देखती
रूपसी अन्य कहीं
नौ -नौ आँसू भर रोती हूँ।
दर्पण कहता
हो एक तुम्हीं
इस धरती पर तुम सुंदरतम
तब चाल
बदल जाती मेरी
बढ़ते जाते ठनगन के बम
मैं देख
नहीं सकती बेहतर
अंसुओं से मुखड़ा धोती हूँ।
शुभमस्तु !
16.09.2025●5.00प०मा०
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