रविवार, 21 सितंबर 2025

श्री' बनाम 'श्रीमती' [ दोहा ]

 572/2025


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दिवंगतों   के  नाम  के,  पहले 'श्री'  प्रयोग।

अनुचित होता है सदा, किंतु करें  बहु लोग।।

छोड़ा   जिसने  देह को, होता 'श्री' विहीन।

प्राणशक्ति  का  नाम है,तन में 'श्री'नवीन।।


'श्रीमती'  नारी  नहीं, तन  तजने  के बाद।

अज्ञानी  वे  लोग    हैं,  जो   फैलाते  गाद।।

स्वर्गीया स्वर्गीय  ही,लिख  सकते हैं  आप।

माता  दादी  बंधु  हों, अथवा  अपने बाप।।


'श्री' ही  जीवन  तत्त्व  है,तन तजने के  बाद।

उड़ जाता भुव लोक में, रह जाती बस याद।।

जब तक जीवन आपका,तब तक जीवन तत्त्व।

प्राण   फूँकता   देह  में, सत्य  श्री का   सत्त्व।।


जीने   पर    रोटी   नहीं,  मरने  पर  दें खीर।

पूड़ी    हलवा  पाक   से,  बदल   रहे तकदीर।।

श्री का  समझा  भाव जो,मानव वही  समर्थ।

दिवंगतों   के  नाम   से, पहले  है  यह व्यर्थ।।


प्राण   बिना अस्तित्व क्या,सब कुछ श्री विहीन।

जैसे जल से  विलग  हो,गई सलिल की  मीन।।

श्री   का   ही  सब  खेल  है,चले देह की    रेल।

प्राण    तत्त्व   है  शेष तो,  और  सभी   बेमेल।।


'श्री'   का   ही  सम्मान   है, शेष हाड़  या माँस।

तब तक  श्री है देह में,जब  तक चलती  साँस।।


शुभमस्तु !


20.09.2025●6.45प०मा०

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