गुरुवार, 18 सितंबर 2025

वर्जित करती यह अंगुलिका [ नवगीत ]

 561/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वर्जित करती

यह अंगुलिका

सारे दिन अर्जित करती है।


मोबाइल पट पर

खट-खट कर

लेखनी कुशल बन जाती है

लिखती कविता

वह व्यंग्य कभी

बनती लेखक की थाती है

गति चक्र

घूमता लगातार

सर्जन में नित्य सँवरती है।


यह अँगुली ही है

आँख कान

यह हाथ पैर भी है मेरा

मन बुद्धि चेतना

प्राण सभी

मेरे जीवन का घन घेरा

सब भूख प्यास

इसमें बसती

दिन रात प्राणता भरती है।


चालित मैं

इससे होता हूँ

जब चाहे तभी जगाती है

कितना भी जागे

'शुभम्' वहाँ

किंचित यह नहीं उबाती है

स्वप्नों में

भाव भरे मन में

तरणी -सी पार उतरती है।


शुभमस्तु!


16.09.2025●4.00 प०मा०

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