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[माता,पिता,पुत्र,पुत्री,परिवार ]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
माता ने संतति जनी,संतति रहे कृतज्ञ।
आजीवन सेवा करे, ईश्वर वह सर्वज्ञ।।
माता के उपकार का , जन्म-जन्म प्रतिशोध।
दे न सके संतति कभी, रहे सदा यह बोध।।
पुत्र पिता का अंश है,वही चलाए वंश।
उसका यह कर्तव्य है,दे न जनक को दंश।।
आत्मज कहते पुत्र को,लेता वह आकार।
पिता चाहते हैं सदा, सुत हो वंशाधार।।
मात-पिता की बात है, इच्छा ही आदेश।
सदा पुत्र को चाहिए, उर में करे प्रवेश।।
पुत्र जनक-सम्मान की,करे न किंचित हानि।
होता वही सुपूत भी,रखे पिता की कानि।।
पुत्री घर की आन है, रमा रूप साकार।
दो कुल की वह ज्योति भी,नवजीवन-आधार।।
पुत्री से संसार है, बढ़े वंश की बेल।
हाँडी सत आचार की,समझ न नारी खेल।।
नहीं चाहते एकता, और न घर में मेल।
खंडित कर परिवार को,खेल रहे कुछ खेल।।
संविधान परिवार का, नेह ऐक्य सम्मान।
तत्त्व अवांछित चाहते, खंडित करें विधान।।
एक में सब
पुत्री हों या पुत्र हों, सब जन हैं परिवार।
पिता और माता युगल, जीवन के आधार।।
शुभमस्तु !
160.9.2025●10.00आ०मा०
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