शनिवार, 20 सितंबर 2025

हिंदी का विस्तार हो [ दोहा ]

 570/2025

   

       


      ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



मूल  रूप   ही शब्द का,मान्य  रहे है   चाह।

नुक़्ता से क्यों मुक्त हो,उचित नहीं यह राह।।

लिपि बदले बदले भले,शब्द न बदले रूप।

'शुभम्' सत्य  यह  मानता,  उर्दू हिंदी   यूप।।


किसी शब्द के भाल पर,नुक़्ता करे कमाल।

मुक्त करो  तो  भंग  हो,मूल रूप का हाल।।

हिंदी  के अनुरूप ये, उचित  नहीं बदलाव।

ढ  ड के  नीचे  लगे, नुक़्ता  भी  सह चाव।।


हिंदी   एक    समूह  है,  भाषाओं   का  रंग।

सब   भाषाएँ   एक  हो, देती हैं शुभ    संग।।

हिंदी  का   विस्तार हो,  सोच  न हो संकीर्ण।

अपनाएँ  नुक़्ता सभी, भाव न करे विदीर्ण।।


बहुवचनों   के  रूप  में,नुक़्ता है जब  मान्य।

चंद्रबिंदु   ऊपर  सजे, ज्यों जीवन में  धान्य।।

अरबी     उर्दू    फारसी,   से  करता परहेज।

हिंदी  बस  संस्कृत  नहीं,खबर सनसनीखेज।।


अँग्रेजी    अपना   रही,  हिंदी  के भी  रूप।

हिन्दीदां  क्यों  खोदते,  हिंदी  को ही  कूप।।

करें   समझ   विस्तार  तो,हिंदी करे विकास।

हिंदी     वाले  ही   बने,  दुश्मन ऐसे खास।।


आओ   हिंदी  के लिए,करें ठोस कुछ  काम।

बहस   वृथा  होवे  नहीं, वही राम हैं   श्याम।।


शुभमस्तु !


20.09.2025●11.45आ०मा०

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