587/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
एक पुजता
एक पिटता
रीति ये कैसी निराली!
भावना
सबकी अलग है
स्वार्थ से पाषाण पुजता
काम निकले
भूल जाए
कान से क्यों शब्द सुनता!
दूध देती
गाय के सँग
काग ने किस्मत बना ली।
पूजते
कुछ लोग रावण
बहुत सारे हैं जलाते
जो स्वयं
रावण चरित के
बाण वे पहले चलाते
जेल से छूटे
मतों से
मान की गठरी सँभाली।
वेश को ही
मान मिलता
नग्नता को कौन पूछे
हो पुलिस
नेता डकैतों की
तनी रहती हैं मूछें
नोट में पावर
पड़ी या
हाथ में पिस्टल दुनाली।
शुभमस्तु !
25.09.2025●2.45प०मा०
●●●
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें