593/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
थोथा चना
बजता घना
सब जानते हैं।
खोमचा जिसका बड़ा है
राह रोके वह खड़ा है
भीड़ नकली
शोर का ये दौर आया
श्वान भौंका गुरगुराया
बजी ढपली
जादूगरी अपनी दिखाते
बोल से जन को रिझाते
हम मानते हैं।
जातिवादी आदमी है
भ्रष्टता फिर लाज़मी है
क्या करोगे
भाषणों के बोल ऐसे
अमिय को दें घोल जैसे
जलदी तरोगे !
इस ठौर पर खूँटा गड़ेगा
जदपि वह पूरा सड़ेगा
जिद ठानते हैं।
साहित्य को क्या हो गया है
आदमीपन खो गया है
नीति टाँगी
जो न होना माँग ऐसी
हो भले ऐसी की तैसी
वीतरागी
शक्ल सूरत आदमी की
दूर हटती सादगी भी
जल छानते हैं।
शुभमस्तु !
27.09.2025●2.15प०मा०
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