580/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पोथी क्रय कीं
दस हजार में
कौड़ी में बिकतीं बेमोल।
हुए गुलाम
डिजीटल के जन
कौन पढ़े अब पोथी खोल
आखर ज्ञान
नहीं है जिनको
सीख रहे वे भाषा बोल
कहते हैं
अपने को शिक्षित
रद्दी में पोथी अनतोल।
ज्ञान नहीं
जन के दिमाग में
चिप में चुप -चुप चलता है
शेष बचा
मोबाइल सिम में
इम्तिहान में ढलता है
पोथी पढ़कर
मरे न कोई
कम्प्यूटर के बजते ढोल।
अब के पंडित
बने डिजीटल
नहीं बाँच पाते पोथी
डिजीटली वे
ब्याह रचाएँ
संतति जनें बनें गोती
निकला
ग्रंथ जनाज़ा अब तो
डिजिट-डिजिट देती रस घोल।
शुभमस्तु !
24.09.2025●11.30आ०मा०
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