598/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
ये दुनिया चेहरों का चमन है। जिसमें भाँति- भाँति के चेहरे चमक रहे हैं।खिलते हुए चेहरे,मुरझाए हुए चेहरे, लटके हुए चेहरे,चौकन्ने चेहरे, चिकने चेहरे,रूखे चेहरे,भूखे चेहरे,सूखे चेहरे,लल्लू चेहरे,चालू चेहरे,टमाटर चेहरे, बैंगन चेहरे, शरीफ चेहरे, फ़क़ीर चेहरे, उलझे हुए चेहरे,सुलझे हुए चेहरे,अन्यमनस्क चेहरे,प्रसन्न चेहरे, उलटा तवा चेहरे,गुलाबी चेहरे। जितने चेहरे उतने भेदोपभेद।कहीं शुष्कता कहीं स्वेद।चेहरों से गहराया हुआ संसार। चेहरों के कर्ता की महिमा अपार !
अलग - अलग साँचों में ढाले गए चेहरे। कुछ बड़े जागरूक कुछ लगे बहरे।देह रूपी किले के मोहरे ,प्रवेश द्वार।अंदर बाहर का एक जीवंत आईना।सबकी अलग -अलग रंगत ,अलग -अलग सङ्गत। कुछ ऐसे भी चेहरे कि झुलसे हुए से। सब कुछ कहे दे रहे बिना एक शब्द बोले हुए। लग रहे नापे हुए तोले हुए। कुछ चेहरे इतने घाघ भी कि पता न लगे सावन फाग भी।कुछ चेहरों से बरसती हुई आग। कहीं दिखा मेरी आँखों से झाग ही झाग। कुछ चेहरे कि कविता गाते हुए ,तरन्नुम में लहराते बल खाते हुए। कुछ तो ऐसे की दुलहिन की तरह शर्माते हुए।
चेहरों के कर्ता की कारीगरी का मैं कायल हूँ। उसकी हर अदा का लॉयल हूँ।कभी- कभी किसी चेहरे की छवि से घायल हूँ।हे कर्ता तू चित्रकार भी तू मूर्तिकार भी है। मुझे तुझसे भक्ति है,दुलार भी है।हे विधाता तूने चेहरों से ये दुनिया सजाई है।यह तेरी माया है कि मौज मजाई है।एक-एक चेहरे को मैंने पढा है,जो-जो मेरे सामने आया है और तूने गढ़ा है।
आदमी के चेहरे में उसकी विगत योनि की परछाईं है।जो तेरे ही चतुर चटुल हाथों की करिश्माई है।मैंने बड़ी बारीकी से यह पाया है किसी का बंदर का तो किसी का भैंसे का बनाया है।कोई गधा है तो कोई फूलों से लदा है। किसी-किसी पर टपकता हुआ धोखा है।कोई कोई बड़ा शातिर है कि जो दिखता है ,वह नहीं होता है।किसी पुरुष में स्त्री का चेहरा मुस्करा रहा है, तो किसी स्त्री में पुरुष गहरा रहा है। उसकी बड़ी न सही छोटी-छोटी प्यारी- प्यारी - सी मूँछें हैं,जो मानो किसी गिलहरी की पूँछें हैं।कुछ चेहरे निरे छूंछे हैं ,जैसे लगते कोई गली कूँचे हैं। कितने ही चेहरे घोड़े और बैल हैं,कोई कोई रंगती तो कोई धुमैल हैं। किसी के चेहरे दर्द टपकता - सा है और उधर कोई वहम में भटकता- सा है।किसी की झलक मात्र से मन अटकता सा है,और उधर किसी एक से खटकता - सा है।नहीं है कोई प्रियता किसी- किसी चेहरे में।किसी को निहार कर मन डूब जाता है गहरे में। रहस्यमय कोई किसी का सपाट चेहरा ,जहां किसी भी रंग का रंग नहीं लहरा। खतरनाक हैं कुछ चेहरों की बनावट ,जैसे हो कोई जन्मजात क्रिमनल की भरे हुए चौधराहट।कोई कोई बड़ा सुलझा-सुलझा- सा तो एक अन्य चेहरा बड़ा उलझा -उलझा -सा।किसी-किसी ने अपने को चेहरे की चिलमन से छिपाया पर वह नहीं जानता कि कहाँ तक छिपा पाया!
ये चेहरे हैं एक खुली हुई किताब। जिन्हें बताना नहीं पड़ा कभी अपना हिसाब -किताब।पर कुछ चेहरों ने दिया है धोखा ही धोखा। वे बाहर से लगते रहे भरा हुआ खोखा किन्तु खोला गया तो मैं देख समझकर चौंका।बन्द किताबों को किसने पढ़ पाया है,ऐसा ही कुछ भेद कुछ चेहरों में समाया है। हे विधाता ये तेरा चेहरों का चित्र- विचित्र चमन है। जिसे देख- देख कर मेरा मन उत्सुक है प्रमन है, तुझको मेरा शतशः नमन है ।
शुभमस्तु !
29.09.2025●4.45 आ०मा०
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