सोमवार, 22 सितंबर 2025

करके देख विचार [ गीतिका ]

 575/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करके देख विचार, बढ़ रहे अति आचारी।

जीवन  है  दुश्वार,कुपथ  जाते नर-नारी।।


मनमानी है  धर्म,  मर्म  में  हिंसा  भीषण,

खोटे  जिनके  कर्म,वही अब धर्मी भारी।


रही न दृग में  लाज, ससुर  सासें पछताते,

बिगड़ रहे गृह-साज, पतन  की है तैयारी।


अपने ही  सुख हेतु,पिता का मान न कोई,

संतति बनती  केतु,  राहु   बनने  की बारी।


भरे  हुए  अखबार,बढ़ा व्यभिचार भयंकर,

खाली  एक  न  वार, निरंतर दूषण जारी।


पैसा  ही माँ-बाप,श्राद्ध  का नाटक होता,

जीवन  में  दें  ताप,  नारियाँ  पैनी आरी।


बिगड़ गया संसार,स्वार्थ में संतति बिगड़ी,

मात-पिता  लाचार, सृष्टि विकृत है सारी।


शुभमस्तु !


22.09.2025●5.30 आ०मा०

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