575/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
करके देख विचार, बढ़ रहे अति आचारी।
जीवन है दुश्वार,कुपथ जाते नर-नारी।।
मनमानी है धर्म, मर्म में हिंसा भीषण,
खोटे जिनके कर्म,वही अब धर्मी भारी।
रही न दृग में लाज, ससुर सासें पछताते,
बिगड़ रहे गृह-साज, पतन की है तैयारी।
अपने ही सुख हेतु,पिता का मान न कोई,
संतति बनती केतु, राहु बनने की बारी।
भरे हुए अखबार,बढ़ा व्यभिचार भयंकर,
खाली एक न वार, निरंतर दूषण जारी।
पैसा ही माँ-बाप,श्राद्ध का नाटक होता,
जीवन में दें ताप, नारियाँ पैनी आरी।
बिगड़ गया संसार,स्वार्थ में संतति बिगड़ी,
मात-पिता लाचार, सृष्टि विकृत है सारी।
शुभमस्तु !
22.09.2025●5.30 आ०मा०
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