574/2025
समांत : आरी
पदांत :अपदांत
मात्राभार : 24.
मात्रा पतन : शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
करके देख विचार, बढ़ रहे अति आचारी।
जीवन है दुश्वार,कुपथ जाते नर-नारी।।
मनमानी है धर्म, मर्म में हिंसा भीषण।
खोटे जिनके कर्म,वही अब धर्मी भारी।।
रही न दृग में लाज, ससुर सासें पछताते।
बिगड़ रहे गृह-साज, पतन की है तैयारी।।
अपने ही सुख हेतु,पिता का मान न कोई।
संतति बनती केतु, राहु बनने की बारी।।
भरे हुए अखबार,बढ़ा व्यभिचार भयंकर।
खाली एक न वार, निरंतर दूषण जारी।।
पैसा ही माँ-बाप,श्राद्ध का नाटक होता।
जीवन में दें ताप, नारियाँ पैनी आरी।।
बिगड़ गया संसार,स्वार्थ में संतति बिगड़ी।
मात-पिता लाचार, सृष्टि विकृत है सारी।।
शुभमस्तु !
22.09.2025●5.30 आ०मा०
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