सोमवार, 22 सितंबर 2025

कुपथ जाते नर-नारी [ सजल ]

 574/2025


         

समांत          : आरी

पदांत           :अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन   : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करके देख विचार, बढ़ रहे अति आचारी।

जीवन  है  दुश्वार,कुपथ  जाते नर-नारी।।


मनमानी है  धर्म,  मर्म  में  हिंसा  भीषण।

खोटे  जिनके  कर्म,वही अब धर्मी भारी।।


रही न दृग में  लाज, ससुर  सासें पछताते।

बिगड़ रहे गृह-साज, पतन  की है तैयारी।।


अपने ही  सुख हेतु,पिता का मान न कोई।

संतति बनती  केतु,  राहु   बनने  की बारी।।


भरे  हुए  अखबार,बढ़ा व्यभिचार भयंकर।

खाली  एक  न  वार, निरंतर दूषण जारी।।


पैसा  ही माँ-बाप,श्राद्ध  का नाटक होता।

जीवन  में  दें  ताप,  नारियाँ  पैनी आरी।।


बिगड़ गया संसार,स्वार्थ में संतति बिगड़ी।

मात-पिता  लाचार, सृष्टि विकृत है सारी।।


शुभमस्तु !


22.09.2025●5.30 आ०मा०

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