शनिवार, 27 सितंबर 2025

अश्व कहते वे स्वयं को [ नवगीत ]

 589/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अश्व कहते 

वे स्वयं को

और सब दिखते गधे हैं।


योग्यता का

ले रखा है

शीश निज ठेका जिन्होंने

सेव कहते

वे स्वयं को

अन्य   को  गूँगे  खिलौने

चाहते हैं

वे बढ़ें बस

साधना   से   वे  सधे  हैं।


संविधान के

निपट विरोधी

आरक्षण के दुश्मन ऐसे

केवल 

वही चाहते जीना

हथकंडे   हैं  कैसे -कैसे

जन्मजात

श्रेष्ठता चाहते

अगड़ेपन की लेज बँधे हैं।


अनुचित होता

यदि आरक्षण

सरकारें क्यों उसे मानतीं

सबका ही 

विकास करना है

क्या सरकारें नहीं जानतीं?

शोषण हुआ

आज तक जिनका

परवशता की आग रँधे हैं।


शुभमस्तु !


27.09.2025● 12.00मध्याह्न

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