गुरुवार, 25 सितंबर 2025

दुर्गा माँ नवरूपिणी [ दोहा ]

 578/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दुर्गा माँ  नवरूपिणी,  महिमा का मकरंद।

यत्र  तत्र    सर्वत्र    है,  दोहाधृत  शुभ छंद।।

हिमगिरि   पर्वतराज  के,घर  में जाई एक।

शैलसुता  देवी  प्रथम,  कहलाई वह नेक।।


ज्ञान और तप दायिनी, ब्रह्मचारिणी  मात।

हरतीं संकट कष्ट को,श्वेत  वसन मय गात।।

लोक  और  परलोक में,करती  हैं कल्याण।

चन्द्रघंटिका  कर  रहीं ,महिषासुर  से त्राण।।


कुष्मांडा माँ शक्ति का,सदा आदि  शुभ रूप ।

अपनी नव  मुस्कान से, सृजन  करें भव यूप।।

कमलासन  पर   सोहतीं,  सिंहवाहिनी  मात।

कार्तिकेय जननी सदा,  देतीं  भक्ति सुजात।।


कात्यायनि  माता सदा, करें  शत्रु बल  नाश।

सुख समृद्धि पोषित करें,नित साहस का प्राश।।

कालरात्रि   तमनाशिनी,  कर  दुष्टों  का  नाश।

भक्तों    की   रक्षा   करें,  दें  शुभता  की आश।।


महागौरि   माता  सदा, तप का दिव्य स्वरूप।

श्यामल   से  गौरी  बनीं, शिव  की कृपा अनूप।।

पद्मासन  में    सोहतीं,  सिद्धिदात्रिका   मात।

शक्ति अलौकिक दे रहीं,निशिदिन साँझ प्रभात।।


माता  के    दरबार  में,  'शुभम्' खड़ा कर जोड़।

कृपा  सिद्धि  वर  दीजिए,नित नव सुखमय मोड़।।


शुभमस्तु !


24.09.2025●4.30आ०मा०

                     ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...