शनिवार, 27 सितंबर 2025

रंजिशों में जी रहे हैं! [ नवगीत ]

 590/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दे सनातन की

दुहाई

रंजिशों  में  जी  रहे  हैं।


'वे' बड़े  हैं

'अन्य ' छोटे

बन गए हैं धुर विरोधी

जन्म से वे

श्रेष्ठ सबसे

समझते खुद को सुबोधी

क्यों बढ़े

आगे पिछल्ले

घूँट  लोहू  पी  रहे  हैं।


मर रहे

बन आत्महंता

जलन की सीमा न कोई

टंगड़ी मारें

गिरा दें

आत्मा  भी   रही    रोई

अधिकार को

निज बाप की

जागीर समझे सी रहे हैं।


कौन  अगड़ा

कौन पिछड़ा

रेस के मैदान आओ

भेद की दीवार

देकर

बीते दिनों को भूल जाओ

चाहते तुम 

रौंदना बस

इसलिए   छी - छी कहे हैं।


शुभमस्तु !


 27.09.2025●12.30प०मा०

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