584/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
उचित नहीं उपहास,शुद्ध हास्य उत्कृष्ट है।
जिसको आए रास,पात्र देखकर कीजिए।।
मित्र कभी उपहास,गुरुजन से मत कीजिए।
है अपमान कुवास,छिपा हुआ उपहास में।।
दुर्योधन - उपहास, द्रुपद सुता ने जब किया।
साथ नाश का वास,महायुद्ध भीषण हुआ।।
यह क्षमता है न्यून,सहन करे उपहास को।
उसे कीजिए चून, उर में भर दे क्रोध जो।।
उचित नहीं है मित्र,असमय का उपहास भी।
शुद्ध हास का चित्र, समय देख आनंद दे।।
उचित नहीं उपहास,कभी किसी के दुःख का।
बात समझ की खास,समय पात्र सब देखिए।।
करें नहीं उपहास, जाकर कभी मसान में।
करें ईश -अरदास, रहना है गंभीर ही।।
शुद्ध हास - उपहास,कविता में कविजन करें।
मन में भरे उजास, हँसते हैं श्रोता सभी।।
जानें भेद अवश्य, हास और उपहास का।
अनुरंजन है दृश्य,खिले हृदय-कलिका जहाँ।।
करना सदा अनीति, दुखदायक उपहास जो।
जगे उरों में भीति, दूषण दे परिवेश को।।
करते यदि उपहास, मत सीमा को तोड़ना।
काट रहे ज्यों घास, अर्थ नहीं बेकाम है।।
शुभमस्तु !
25.09.2025●5.15 आ०मा०
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