शनिवार, 27 सितंबर 2025

शौक कुछ ज्यादा चढ़ा है! [ नवगीत ]

 591/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खून पीने का

तुम्हें ये

शौक कुछ ज्यादा चढ़ा है!


चाहते तुम

शीश चढ़कर

बैठना ऊपर शिखर पर

'वे' करें

सेवा तुम्हारी

पाँव छूएँ हर  डगर दर

जान लो

हर पेड़ का कद

लहरता ऊपर बढ़ा है।


स्वच्छंदता की

वायु में सब

पेड़ साँसें  ले  रहे हैं

खाद भी

उनको मिला तो

चोटियों को छू रहे हैं

कर्म ही

अभिजात्यता है

कर्म ने गढ़ को गढ़ा है।


रक्त लेते

गैर का जब

जाति तब जाती कहाँ है

जाति पूछो

होटलों में 

तब नहीं लगता धुँआ है ?

लोटते चूहे

उदर में

आँत जाती फड़फड़ा है।


शुभमस्तु !


27.09.2025●1.00 प०मा०

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