596/2025
समांत : ओल
पदांत : अपदांत
मात्राभार : 24.
मात्रा पतन : शून्य
©शब्दकार
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जीवन है तप - साधना , वचन तोल कर बोल।
वृथा नहीं गारत करे, रहे सदा अनमोल।।
कर्मयोनि ही जानिए, रहे भोग से दूर।
श्रेष्ठ कर्म जो भी करे, रहे न डाँवाडोल।।
कुछ नर ऐसे लालची,चलें कुपंथ कुराह।
कटु कुनैन - सा बोलते, देते हैं विष घोल।।
संघर्षों की वह्नि में,तपे मनुज जो आज।
सोने- सा निखरे वही, मिले उसे अनतोल।।
बोए बीज बबूल का, उगता नहीं रसाल।
अनगिनती कंटक मिलें,फटे जन्म का ढोल।।
कथनी -करनी एक हों,कर ले आत्म सुधार।
तन रँगने से क्या मिले,ऊपर का यह खोल।।
'शुभम्' जहाँ से तू चले, आता है फिर लौट।
दुनिया में देखा यही, यह धरती है गोल।।
शुभमस्तु !
28.09.2025● 10.15 प०मा०
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