शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

हँसना या मुस्कराना [ व्यंग्य ]

 478/2025


 

 © व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 यद्यपि मनुष्य अन्य जंतुओं की तरह ही एक जंतु है।किंतु उसकी ऐसी कुछ विशिष्टताएँ हैं ,जो अन्य जंतुओं में नहीं मिलतीं।उसमें बहुत सारी ज्ञात अज्ञात विशिष्टताएँ होंगीं ,किंतु हम यहाँ पर उसकी मात्र एक विशेषता हँसने या मुस्कराने पर चर्चा की चौपाल सजाने वाले हैं। 

 घोड़ा, गधा, गाय, भैंस, बकरी, भेड़,ऊँट,हाथी,तोता, मैना, मोर, गौरैया,तीतर,बटेर,शेर,चीता,गीदड़, हिरन,ऊदबिलाव,बारहसिंहा,मछली,कछुआ,मेढक आदि अनेक थलचर,जलचर,नभचर,सरीसृप आदि का अस्तित्त्व संसार को आबाद किए हुए है।किंतु इनमें से मनुष्य के अतिरिक्त किसी को हँसते -मुस्कराते हुए नहीं देखा सुना गया। यह विशिष्टता केवल मनुष्य में ही पाई जाती है। 

 हँसना या मुस्कराना दोनों प्रतीक हैं। सामान्यतः ये दोनों हर्ष के प्रतीक ही माने जाते हैं;किंतु कभी- कभी किसी विशेष परिस्थिति में इसके विपरीत अर्थ भी दे जाते हैं।हँसने की क्रिया में मुख से ध्वनि हो सकती है और नहीं भी हो सकती ।यह हँसना भी कोई सामान्य नहीं है। यह भी एक नहीं सात प्रकार का होता है। स्मित,हसित,विहसित,उपहसित, अपहसित,अतिहसित और अट्टहास।यह 'स्मित' हास्य ही मुस्कराना है। जिसमें सौम्य प्रकृति के व्यक्ति इस प्रकार धीरे से हँसते हैं,कि कोई ध्वनि नहीं होती और होंठ गुलाब की कली की तरह किंचित खिलकर रह जाते हैं। 'हसित' स्मित से किंचित विस्तार लिए हुए है और यह हास्य भी सौम्य प्रकृति के लोगों का विशेष गुण है। हसित से भी व्यापक और बड़ा रूप 'विहसित' का है,जो मध्यम कोटि के मानवों के लिए है।इसमें होंठ अधिक खुलते हैं और दंतदर्शन भी हो जाता है।जब हँसने के साथ नासिका फूल कर कुप्पा हो जाए और होंठ भी वक्रता लिए हुए हों,तो यह मध्यम प्रकृति के लोगों के लिए 'उपहसित' की स्थिति है।अधम प्रकृति के लोग 'अपहसित' कोटि का हास्य करते हैं;जिसमें उनकी अश्लीलता और ओछेपन का भाव भी झलकने लग जाता है। 'अतिहसित' हास्य का तीव्रतर रूप है, जो अधम कोटि के मनुष्यों में देखा जाता है।यह असभ्यता लिए हुए होता है। इनमें सबसे बड़ा और निकृष्ट रूप 'अट्टहास' का है, जिसमें पूरा शरीर हिलने लगता है और व्यक्ति हो हो हो हो, ही ही ही ही जैसी ध्वनियाँ करते हुए जोर -जोर से हँसता है।

 हास्य के उक्त सात भेदों के बाद आचार्य केशव दास ने हास्य के चार रूप प्रमुखता से व्यक्त किए हैं। धीमी और हल्की मुस्कान को उन्होंने 'मंदहास' का नाम दिया है।मधुर और सुखद हँसी को उन्होंने 'कलहास' कहा है। बहुत तेज अट्टहास को 'अतिहास' की संज्ञा दी है। हास्य के चौथे रूप को 'परिहास' कहा गया है।जो व्यंग्य से भरा हुआ रहता है।

 हास्य के एक अन्य वर्गीकरण के अनुसार आत्मस्थ, परस्थ,मृदुहास और अट्टहास इसके चार भेद भी किए जाते हैं। जो पात्र और स्वयं को अनुभव होता है,वह 'आत्मस्थ हास्य' है। जो हास्य दूसरों को हँसाता है ,वह 'परस्थ हास्य' है। 'मृदुहास' धीमा और गुप्त होता है। और अंतिम है 'अट्टहास' ,जो मुखर प्रबल और खुलापन लिए हुए होता है।


 कुछ लोगों में दूसरों को हँसाने का विशेष गुण होता है।जिनकी हर बात में हास्य होता है।यह कोई मामूली बात नहीं है।हास्य कवि अपनी कविता या कवितात्मक उक्तियों से दर्शकों और श्रोताओं को लोटपोट कर देते हैं।वे इसी बात की रोटी खाते हैं। कुछ ऐसे भी हास्य अभिनेता हैं कि उनके अपने चेहरे पर हास्य की लकीर भी नहीं और उधर श्रोता लोटपोट हुए जा रहे हैं।किसी को रुलाना जितना आसान है ,उतना हँसाना नहीं। फिर आज के युग में आदमी की हँसी तो महँगाई और रही बची सो लुगाइयों ने अपहृत कर रखी है। कोई हँसे तो कैसे हँसे। कभी- कभी तो हँसे कि फँसे ! आदमी के मष्तिष्क में कुछ ऐसे हार्मोन प्रसर्वित होते हैं ,जो उसे हँसने के लिए प्रेरित करते हैं अथवा हँसने से और ज्यादा आने लगते हैं।एंडोर्फिन,डोपामाइन और सेरोटोनिन ऐसे ही हास्य के कारक हार्मोन हैं , जो अन्य जन्तुओं में नहीं होते। 

 हँसें भी हँसाएँ भी ; किन्तु किसी की हँसी न उड़ाएं।हँसना -हँसाना सकारात्मक भाव हैं ,किंतु दूसरों की उड़ाने पर वे कड़वे कसैले और नकारात्मक हो जाते हैं।आज के युग में हँसी बहुत मँहगी हो गई है। हास्य के लिए हास्य योग की क्रिया का भी सुझाव दिया जाता है।किंतु हँसी नकली नहीं हो सकती। फिर तो खीसें निपोरना भर रह जाएगा।हास्य में स्वाभाविकता और सहजता अनिवार्य है।इसलिए किसी और पर मत हँसें। हँसाये अवश्य।हँसी नहीं कोई नश्य कि नाक में ठूँस ली और हो गया हास्य। मनुष्य के लिए यह अपरिहार्य है अवश्य।आइए हम सब कुछ देर हँसते हैं और अपने फुफ्फुस को हँस -हँस कर मजबूत करते हैं। हास्य है तो हर्ष है, उत्कर्ष है,क्षीण होता हुआ संघर्ष है।दिन रात माह और प्रसन्न पूरा वर्ष है। हास्य है तो जीवन में नहीं कहीं अमर्ष है।

शुभमस्तु ! 

 29.08.2025●1.45 प०मा० 


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