रविवार, 3 अगस्त 2025

वर्षा सुखद सुहावनी [ दोहा ]

 392/2025


            

[वर्षा,किसान,हल,फ़सल,अनाज]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


वर्षा  सुखद   सुहावनी,सावन भादों  मास।

आशाएँ   भरपूर   हैं, भरा   हुआ विश्वास।।

वर्षा  से   समृद्ध  हैं, खेत  बाग  वन  मित्र।

धरती  से  उड़ने  लगा,  सौंधा- सौंधा  इत्र।।


हल बैलों को साथ में,लेकर चला किसान।

हर्षित  हैं नर-नारियाँ, देखा सुखद विहान।।

फल सब्जी  हर  अन्न का,उत्पादक है एक।

सबका  बंधु किसान  है,गृही तपस्वी नेक।।


कंधे   पर हल को  रखे, कर में थाम  लगाम।

चला कृषक कर्षण करे,तनिक नहीं  विश्राम।।

हल करना हर  हाल में,कठिन समस्या  मीत।

समाधान  करते   रहो,  सदा मिलेगी   जीत।।


करे   ईश  से  प्रार्थना,  कुशल  करे भगवान।

फसल पके धन-धान्य से,भरे गेह खलिहान।।

फसल झूमती  खेत में,  नाच उठे मन   मोर।

मुदित कृषक नारी सभी,सुखद सुहानी भोर।।


चना    मटर   गोधूम    से, भरा  रहे ये   देश।

सबको मिले अनाज का,उचित भाग हर वेश।।

नाली    में   फेंकें   नहीं, नष्ट  न करें अनाज। 

उतना  थाली   में  रखें,  जितना पड़ना काज।।


               एक में सब

वर्षा  आई झूमती,हर्षित फसल   किसान।

हो  अनाज भरपूर ही,हल हों प्रश्न   महान।।


शुभमस्तु !


03.08.2025● 8.00आ०मा०

                     ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...