403/2025
[संन्यास,अभिषेक,आलोक,विरासत,रक्षासूत्र]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
गृहस्थाश्रम संन्यास से,किंचित न्यून न आँक।
मिले न रोटी पेट को,तनिक हिए में झाँक।।
संन्यासी संन्यास में, जीता आत्महितार्थ।
गृही पालता विश्व को,करता है परमार्थ।।
जीना है यदि शांति से, करे आत्म अभिषेक।
धैर्य न किंचित त्यागना,रखना सदा विवेक।।
मानवता सद्धर्म है,तजे न पल को एक।
सत्कर्मी अभिषेक से, रहे सदा ही नेक।।
कर्मों के आलोक में, मिलती मंजिल मीत।
स्वतः मिटे तम राह का, होती ही है जीत।।
जीवन में आलोक ही, दिखलाता है राह।
भटक रहीं बहु योनियाँ,दूषित जिनकी चाह।।
सदा विरासत कर्म की,पथ में दे आलोक।
मनुज योनि तमहीन हो,रहे न किंचित शोक।।
पिछली पीढ़ी ने दिया, रखना उसे सँभाल।
नाशवान नर देह है, उच्च विरासत ताल।।
रक्षाबंधन पर्व है, भ्रात-भगिनि का प्यार।
रक्षासूत्र प्रतीक में, बँधा सकल संसार।।
बंधु - भगिनि इस देश के,करना है प्रण त्राण।
रक्षासूत्र न तोड़िए, यद्यपि हो म्रियमाण।।
एक में सब
रक्षासूत्र विरासती, कर देता आलोक।
दूर रहे संन्यास से,कर अभिषेक विशोक।।
शुभमस्तु !
06.08.2025●3.00आ०मा०
●●●
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें