396/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जो दूर नहीं हो सकता,'उसकी' चर्चा भी नहीं की जाती।यह मान कर चला जाता है कि 'यह' तो सदैव पास में ही रहना है,इसलिए इसकी चर्चा भी क्यों की जाए !'वह' तो इस देश के नर और नारी, व्यभिचारी या ब्रह्मचारी ,हमारी या तुम्हारी नस- नस में प्रवाहित है,इसलिए 'उसे' सर्व स्वीकृत मान लिया गया है।'उसके' बिना इस देश के आदमी और औरत का काम नहीं चल सकता।अब चाहे 'वह' ऊँची से ऊँची कुर्सी पर बैठा हो अथवा सर्राफे की मोटी मसनदी गद्दी पर लेटा हो।यह - वह नहीं करेगा तो वहाँ बैठा ही किसलिए है ? यह तो होना ही है। यह तो करना ही है। आंग्ल भाषा में कहें तो यह अंडरस्टूड है।
'वह' बहुरूपिया है। जहाँ जाता है अथवा रहता है ;वहाँ अपना नाम और रूप बदल लेता है। व्यापार में इसे लाभ या मुनाफ़े के रूप में जाना जाता है,जिसकी कोई सीमा नहीं है। भले ही भैंस समेत खोया कर दो,कहलायेगा यह व्यापार ही।दस की वस्तु सौ या हजार में बेच लो, यह बिजनिस मैनेजमेंट है।पीतल को सोने के भाव बेचना भी यहाँ अपराध नहीं है।कम तोलना कम नापना भी इसी श्रेणी में आता है।एक किलो की जगह नौ सौ ग्राम दे देना विक्रेता की होशियारी मानी जाती है। ठेले वाला बड़े बड़े पकें हुए आम सामने सजा कर रखता है,किन्तु जब ग्राहक को तौल कर देने की बारी आती है ,तो अपने ही पास रखे छोटे -छोटे और दाग लगे हुए सड़े -गले आम इस चालाकी के साथ काली पॉलीथिन की थैली में भर देता है कि क्रेता को इसकी भनक भी नहीं लगती कि उसे ठगा जा रहा है।ग्राहक जब घर जाकर थैली खोलता है तो आम ,सेव या अन्य कोई फल सड़े हुए पाता है तो माथा पीट लेता है।यहाँ दाल में नमक नहीं खाया जाता, नमक में दाल खाई जाती है।यदि दुकानदार का वश चले तो ग्राहक की गर्दन पर छुरी फेर दे और उसकी जेब ही उड़ा दे। बहुत सी बार ऐसा होता भी है।जैसी दुकानदारी वैसी कटाई।कहने को तो दुकानदार के लिए ग्राहक भगवान होता है ,किंतु वास्तविकता में वह उसके लिए वह मुर्गा होता है,जिसकी गर्दन पर छुरी फेरने की ताक में वह बैठा रहता है।
राजनीति या किसी सरकारी नौकरी में 'उस' 'अचर्चेय' को बहुत ही सजीले - धजीले नामों से सँवारा जाता है। कहीं वह 'सुविधा शुल्क' है तो कहीं 'कमीशन', कहीं 'इनाम' है तो कहीं कुछ और। अंततः छुरी ग्राहक की गर्दन पर ही फेरी जाती है। कहीं किसी को 'खुश' करने के लिए 'इनाम' की माँग की जाती है। बस का टिकट होता है पचास रुपये साठ पैसे , अब परिचालक चालीस पैसे कहाँ से लाए ! दस पांच या चवन्नी अठन्नी तो चलन में ही नहीं है, इसलिए नहीं लौटाए गए वे पैसे उसकी 'ईमानदारी' से उसके हो गए। यात्री क्या करे ,उसे यात्रा तो करनी ही है। अब मात्र चालीस पैसे के लिए न तो झगड़ा कर सकता है और न बस से उतर सकता है।इस प्रकार पूरे दिन में इसी प्रकार की 'ईमानदारी' के सैकड़ों रुपये कमा लेता है।यह ऊपरी कमाई है।
'ऊपरी कमाई' बहुत जोरदार शब्द है।जो प्रत्येक सरकारी विभाग में जायज है। कुछ लोग तो इसीलिए सरकारी नौंकरी करते हैं ,क्योंकि वहाँ 'ऊपरी कमाई' का अच्छा -खासा इंतजाम है।जिस नौंकरी में 'ऊपरी कमाई' न हो ,वह नौंकरी अच्छी नहीं मानी जाती। इस काम के लिए पुलिस,राजस्व,विभिन्न सरकारी दफ्तर अच्छे माने जाते हैं। आम और खास आदमी के दिल में यह संस्कार अच्छी तरह से बैठा दिया गया है कि ईमानदारी से भी कहीं घर चलता है ! नीचे की कमाई से क्या होता है? कमाई तो ऊपर की ही काम आती है। ईमानदारी से अर्जित वेतन को 'नीचे की कमाई' कहा जाता है। आदमी की सोच का कितना विस्तार हुआ है कि अकल्पनीय है !
आज विद्या के मंदिर कहे जाने वाले स्कूल कॉलेज भी किसी सरकारी दफ्तर से कम नहीं हैं। वे उनके भी बाप के भी बाप हैं।वे अब मंदिर नहीं ,उद्योग धंधे ,नोट छापने की टकसालें ,कम्पनियां, अथवा फैक्ट्रियां कहे जा सकते हैं। वहाँ शिक्षा मिले या न मिले , कॉपी किताबें पेंसिल पटरी कपड़े टाई बेल्ट से लेकर जूते तक मिल जाते हैं। सुविधा या फ़ेसलिटी के नाम पर अभिभावक को लूटा जा रहा है। अभिभावक की यह मजबूरी है कि उसे अपने पाल्य को पढ़ाना है,इसलिए स्कूल कालेज वालों की मनमानी को सहते जाना है।
आज के युग में ईमानदारी 'मूर्खता' का पर्याय बन चुकी है। जो जितना बड़ा ईमानदार ,उतना ही बड़ा मूर्ख। सत्य सचाई और सादगी किसी को भी पसंद नहीं हैं। विवाह शादियों या अन्य समारोहों के अवसर पर पैसे में आग लगाने का काम जितनी कुशलता से एक 'ऊपरी कमाई' करने वाला कर सकता है,उतना एक ईमानदार या गरीब आदमी नहीं। आज निर्धन और गरीब या ईमानदार को समाज में बैठने या रहने योग्य नहीं समझा जाता। पैसे की चमक- दमक बिना उस 'अचर्चेय' के नहीं आ सकती। यह ऊपरी चमक ही तो आदमी को आकर्षित करती है।कोई भी साधन के स्रोत की तह में नहीं जाना चाहता।उसे करना भी क्या ?पैसे की खुशबू से ही सब ग्लैड हुए जा रहे हैं। इसी 'अचर्चेय' के कारण खाकपति नेता अरबों खरबों में क्रीड़ा करता है। बस उसकी चर्चा मत करो कि उसका स्रोत क्या है?वह कहाँ से लाया ? यदि नियमित तनख्वाह से ही कोई करोड़पति हो जाता तो देश के सभी ईमानदार नोटों में खेलते! नोट ही खाते, नोट ही ओढ़ते बिछाते।उनके भी बच्चे दाल रोटी नहीं,पीज़ा बर्गर उड़ाते!
सब लोग सबकी जानते हैं,तो चर्चा कैसी? मैं न कहूँ तेरी, तू न कहे मेरी। फिर चर्चा हो ही क्यों घनेरी? पूँछ तले मादाएँ जो सिमटी हुई हैं! जिनको उठाने का साहस करने की किसी को जरूरत ही क्या है?और हो भी क्यों !देश और समाज में पिचानवे फ़ीसदी इन्हीं मादाओं का आधिपत्य है ।इसलिए सब कुछ 'अचर्चेय' है। क्या नौकर क्या व्यापारी , क्या नेता क्या अधिकारी, क्या आम क्या खास, सब जगह एक ही बास,फिर क्यों किया जाए उस 'अचर्चेय' का नाश ! और उड़ाया जाए उपहास ! अब सबको आ ही रहा है रास! क्या अब भी नहीं हुआ आपको उसका आभास! तो एक शब्द में कान रोप कर,आँखों को तोप कर, बिना लेश मात्र कोप कर जान लीजिए वह 'अचर्चेय' 'महान' है : 'भ्रष्टाचार'।
शुभमस्तु !
04.08.2025●8.45 आ०मा०
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