405/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
अहंकार का रैपर
इनका
कब तक रहना !
मैं ही श्रेष्ठ ज्येष्ठ
मैं ही सब
कौन टिकेगा
झुका सभी को
देना है
हम नहीं झुकेगा
एक नहीं अपशब्द
किसी का
मुझको सहना।
जल कर होती खाक
लेज
फिर भी बल जिंदा
रही न मुख पर नाक
नहीं
किंचित शरमिंदा
बनी हुई जो ऐंठ
वही है
स्वर्णिम गहना।
जाति -जाति की जंग
कहाँ
मानवता तेरी
करता रहा दुराव
खोपड़ी
बजे घनेरी
मुर्दों के ही साथ
नदी में
बहते रहना।
शुभमस्तु !
06.08.2025● 6.15 प०मा०
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