423/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सरस्वती
गङ्गा व यमुना की
त्रिवेणी में नहा ले।
ये सुषुम्ना
सरस्वती है
पिंगला भी है इड़ा भी
यमुन धारा
संग गंगा
शीर्ष पर ऊँची चढ़ाई
निज अहं का
कुटिल कचरा
आग में मानव दहा ले।
कुंभ क्यों
भीतर छिपाया
उधर जाकर ढूँढता है
क्यों नहीं
गोता लगाता
मानवी ये मूढ़ता है
गंदगी को
ढो रहा है
क्यों नहीं उसमें बहा ले !
खोल मन का
दर अरे नर
देह में मंदिर तुम्हारे
ईंट पत्थर
पूजता है
जी रहा मृत के सहारे
पिंड में
ब्रह्मांड तेरे
निबिड़ अंतर में उजाले।
शुभमस्तु !
11.08.2025● 2.30 प०मा०
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