बुधवार, 13 अगस्त 2025

कहता सब बेकार है! [ नवगीत ]

 428/2025


     

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक शब्द में

खोट निकाले

कहता सब  बेकार है।


तूती अपनी 

बजा - बजा कर

करता है अति शोर

पढ़ता नहीं

शब्द भी आगे

कहता है कमजोर

लिखने वाला

चुप ही बैठा

क्या करता लाचार है!


बढ़े न कोई

उससे आगे

शायद हो ये सोच

गिरा रहा है

उच्च मनोबल

लक्ष्य करे यह पोच

क्या कमियाँ हैं

नहीं बताए

ब्रह्मा का अवतार है।


समय नहीं

ऐरों - गैरों को

ऊपर से आ उतरा

जन्मा था

साक्षात मनीषी

नहीं बोलता सुथरा

डांट रहा 

पैदल वालों को

जिस पर बंगला कार है।


एक गैंग का

लीडर कोई

जैसे नहीं किसी की सुनता

पूर्वाग्रह से 

ग्रसित आदमी

रखे कमर पर कर को तनता

नहीं सकेगा

रोक राह को

कैंची छुरा कटार है।


नहीं सहज ये

बने द्रोण तू

एकलव्य फिर भी आए

बंद करे

कुत्ते के मुख को

द्रोण अँगूठा कटवाए

लगता है

बढ़ जाए कोई

तेरे सिर का भार है।


शुभमस्तु !


13.08.2025● 9.00 आ०मा०

                     ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...