बुधवार, 27 अगस्त 2025

श्वान सेवा सदाबहार [ दोहा ]



 472/2025


        

[संप्रति,सुविधा,साधना,संजीवनी,सदाबहार ]


©शब्दकार

डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक


संप्रति  सारे   देश  में, सुलभ श्वान   संगीत।

भों - भों  करते भक्त हैं, कहें  श्वान हैं   मीत।।

पूँछ  हिलाते  श्वान  का, संप्रति शुभ  संकेत।

प्रेम  भाव   जाग्रत  हुआ, भोंक उठे समवेत।।


सुविधा भोगी  श्वान को, मिले न कोई  कष्ट।

जब  चाहें तब भोंक  लें,रहें  न पल को  मष्ट।।

सुविधा श्वानों को यही, नर -नारी को  पाल।

सड़कों  पर  टहला  रहे,यह भी एक मिशाल।।


श्वान - साधना  लीन  हैं,बहु नर -नारी  आज।

डनलप गद्दे  पर  करें, शयन  न  आते   बाज।।

श्रेष्ठ साधना  श्वान की, मात-पिता  को  छोड़।

श्वान दूध   रोटी  चरें,लें   उनसे  मुख     मोड़।।


श्वान - सनेही   आदमी, रहा  न  जन से   नेह।

वे  घर   की   संजीवनी,  शोभित उनका गेह।।

सेवा   में  निज  श्वान की, संजीवनी  अनूप।

घर  की  देवी  को  मिली, पिला रही हैं   सूप।।


श्वानों    को    मिलने लगी, सेवा सदाबहार।

सास - ससुर    भूखे   मरें, पड़े- पड़े बेजार।।

दूध     मलीदामार     हैं,    कूकर सदाबहार ।

मानव  को  रोटी  नहीं,  सूखी भी दो- चार।।


                 एक में सब

संप्रति  सुविधा  साधना, श्वान सभी  संलग्न।

आई     सदाबहार  है, संजीवनी      सुमग्न।।


शुभमस्तु !


26.08.2025●11.45प०मा०

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[10:43 am, 27/8/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

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