472/2025
[संप्रति,सुविधा,साधना,संजीवनी,सदाबहार ]
©शब्दकार
डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
संप्रति सारे देश में, सुलभ श्वान संगीत।
भों - भों करते भक्त हैं, कहें श्वान हैं मीत।।
पूँछ हिलाते श्वान का, संप्रति शुभ संकेत।
प्रेम भाव जाग्रत हुआ, भोंक उठे समवेत।।
सुविधा भोगी श्वान को, मिले न कोई कष्ट।
जब चाहें तब भोंक लें,रहें न पल को मष्ट।।
सुविधा श्वानों को यही, नर -नारी को पाल।
सड़कों पर टहला रहे,यह भी एक मिशाल।।
श्वान - साधना लीन हैं,बहु नर -नारी आज।
डनलप गद्दे पर करें, शयन न आते बाज।।
श्रेष्ठ साधना श्वान की, मात-पिता को छोड़।
श्वान दूध रोटी चरें,लें उनसे मुख मोड़।।
श्वान - सनेही आदमी, रहा न जन से नेह।
वे घर की संजीवनी, शोभित उनका गेह।।
सेवा में निज श्वान की, संजीवनी अनूप।
घर की देवी को मिली, पिला रही हैं सूप।।
श्वानों को मिलने लगी, सेवा सदाबहार।
सास - ससुर भूखे मरें, पड़े- पड़े बेजार।।
दूध मलीदामार हैं, कूकर सदाबहार ।
मानव को रोटी नहीं, सूखी भी दो- चार।।
एक में सब
संप्रति सुविधा साधना, श्वान सभी संलग्न।
आई सदाबहार है, संजीवनी सुमग्न।।
शुभमस्तु !
26.08.2025●11.45प०मा०
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[10:43 am, 27/8/2025] DR BHAGWAT SWAROOP:
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