448/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कभी-कभी
वर्जन भी
सर्जन बन जाता है,
जैसे दवा -दारू में
दवा के साथ दारू।
यह एक सानुप्रसिक
तुक्कड़ भर है,
वरना दवा के साथ
दारू का क्या काम,
कोई संगति नहीं।
दवा तो ठीक
पर दारू का क्या!
वह तो चिकित्सा साधनों
का इत्यादि है,
यहाँ दवा में नहीं
किसी दारू का स्वाद है।
गेहूँ के साथ
घुन भी पिस जाता है,
वैसे ही दवा के साथ
दारू का नाम
आ जाता है,
आदमी को
दारू से भी तो
विशेष लगाव है।
कॉफी में कॉकरोच का
स्वाद नहीं आता,
वैसे ही दवा के साथ
दारू का विचित्र नाता,
आदमी है
आदमी ही तो
शब्द को तानता
विस्तृत फैलाता!
यह साहित्य है
साहित्य भी तो
शब्दों की खेती करता
भंडार भर लाता।
शुभमस्तु !
21.08.2025 ● 1.45 प०मा०
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