सोमवार, 18 अगस्त 2025

बड़े भाग्य से मिले बुढ़ापा [ नवगीत ]

 439/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

  

बड़े भाग्य से

तप में तापा

मिले बुढ़ापा।


शैशव में 

तू बना खिलौना

घर भर खेला

यौवन जैसे

एक बिलौना

सबने झेला

गिरे दाँत

है शुष्क आँत

क्या करे बुढ़ापा !


कुछ सुख बीते

नव सुख आए

बूढ़ा जाने

जो भाते थे

वे अनभाए

मिलते ताने

मिल रही उपेक्षा

यही सुशिक्षा

क्या गज़ब बुढ़ापा!


 पिछले बिचले

अनुभव मीठे

कड़ुए खट्टे

लगते मधुरिम

गोरस घी-से

सत के सत्ते

अज्ञान मिटाया

तमस हटाया

क्या सुखद बुढ़ापा!


शुभमस्तु !


18.08.2025● 11.00आ०मा०

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