466/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सकारात्मक सोच
नकारात्मक सोच
एक मजबूत
एक पोच,
इधर वेतन
उधर उत्कोच।
जीवन है तो
समस्याएँ भी हैं
पूर्णिमाएं है तो
अमावस्याएँ भी हैं,
उजाला और
अँधेरा सब कुछ है।
जैसे भी देखो
समस्या को
उलझाव लगे तो
कष्टप्रद है,
सकार सोच हो तो
अभीष्टप्रद है।
जी नहीं सकता
मानव समस्या के बिना
वही तो उसके हाथ हैं
वही आगे बढ़ते हुए पाँव हैं।
सोच को सशक्त
सकारात्मक बनाना है,
सफलता की
सीढ़ियों पर
अनवरत चढ़ते जाना है,
ये कोई उपदेश नहीं
सिद्धांत है
जो हमें अपनाना है।
शुभमस्तु !
24.08.2025●9.15आ०मा०
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