बुधवार, 20 अगस्त 2025

किस चिंता में खोई हो [ गीत ]

 443/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दृष्टि शून्य की ओर लगी है

किस चिंता में खोई हो।


थामे एक बगल में घट को

किसने यों मजबूर किया

अपनापा खो गया तुम्हारा

हे नारी क्यों दुखी हिया

लगता है सारी रातों तुम

भर-भर  आँसू रोई  हो।


पनघट पर  जाते -जाते यों

किसने है ये दुख भेजा

रिक्त घड़ा लगता  मिट्टी का

चुभा हुआ उर में नेजा

आँखों से भी नींद दूर है

नहीं रात भर सोई हो।


जीवन चिंताओं से  भारी

उनका बोझ   उठाना   है

करने भी हैं काम सभी ये

सुख-दुख सभी निभाना है

हो कृशकाय 'शुभम्' हे रमणी

सश्रम स्वेद  भिगोई  हो।


शुभमस्तु !


19.08.2025● 2.15 आ०मा० (रात्रि)

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