गुरुवार, 21 अगस्त 2025

आदमी में यदि डाह न होती [अतुकांतिका ]

 449/2025


    


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी में आदमी के प्रति

यदि डाह न होती

तो रक्त मांस के दिलों में

पत्थरों की सड़क नहीं होती।


टंगड़ी मारने का

हुनर काम नहीं आता

टाँग मारते समय

थोड़ा तो शर्माता

लजाता 

आँखें चुराता!


पर क्या करें

आँखें झूठ नहीं बोलतीं

चेहरे की लिपि

हर भेद को खोलती।


बिना डाह के

आदमी देवता हो जाता

पर उसे तो 

राक्षस होने में ही

विषेशानंद आता

इस सुअवसर को

आदमी क्यों छोड़ पाता!


मत छोड़ना रे डाह

भूल से भी हे मानव !

हो गया अगर कहीं तू

तो बनेगा देवता का ढब

तू मनुष्य है

मनुष्य ही बना रह

सत्त्व की पगडंडियों पर

भूल से भी न बह।


शुभमस्तु !


21.08.2025●4.30 प०मा०

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