रविवार, 24 अगस्त 2025

बदलाव की छवि [अतुकांतिका]

 458/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कभी किसी का नहीं हुआ

हमेशा बदलते स्वभाव का

अब वह चाहे आदमी हो

या समय ही  क्यों न  हो।


बनानी  पड़ती  है अपनी एक  छवि

विचलित कब  होता है पथ  से रवि

एक पल की भी देरी न कभी जल्दी

उजाले से उसने ये   दुनिया भर दी।


कभी तोला  है  तो  कभी माशा

लगाए भी कोई कब तक आशा

बदलते स्वभाव की  ये चंचलता

छवि का बिम्ब बिगाड़ ही देती है।


व्यक्तित्व को मील का पत्थर बना

सूखी टहनी की तरह मत रह तना

जिंदगी की कोई नजीर बन जाए

सूरज चाँद की तरह ज्योतित हो जा।


हिमाचल  भी एक दिन में नहीं बना

सागर  का   गह्वर  भी  इतना गहरा

बात की कीमत  को  जानना होगा

आदमी आदमित्व का बदल दे चोगा।


शुभमस्तु !


230.8.2025●9.30आ०मा०

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