बुधवार, 13 अगस्त 2025

आज के कविजन धुरंधर [ नवगीत ]

 430/2025

    ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पीठ अपनी

थपथपाते

आज के कविजन धुरंधर।


बंधु मौसेरे

सभी ये

जी रहे अनुबंध से ही

अगरबत्ती को

जलाकर 

पी रहे सदगन्ध को ही

ध्वनि करे

विस्तार तो ये

खुद समझते हैं पुरंदर।


भेज पेटीएम से

कुछ राशि 

ये करते प्रंबंधन

शॉल माला

नारियल से

पुज रहे सब करें वंदन

शुभ प्रतीकों से

सजा है

देह बाहर से न अंदर।


पुज रहा

पैसा यहाँ पर

पुजती नहीं कविता कहीं

राजनैतिक 

बल्लियों पर

है  टिकी  कवि   बानगी

छंद से 

अज्ञानता है 

उछलते ज्यों  आम्र बंदर।


शुभमस्तु !


13.08.2025 ●10.30 आ०मा०

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