386 /2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
राधा मधुवन को चलीं, अमराई की छाँव।
कान्हा जी भी त्यागते, नंदधाम निज गाँव।।
नंदधाम निज गाँव,मिलन-आकांक्षा भारी।
टिकें न भू पर पाँव, मिलें वृषभानु दुलारी।।
'शुभम्' जहाँ हो चाह,नहीं आती पथ बाधा।
हृदय करे अवगाह, त्वरा में जातीं राधा।।
-2-
राधा का वादा यही, मिलना मधुवन- कुंज।
आता जाता हो नहीं,नर-नारी जिस पुंज।।
नर -नारी जिस पुंज, न कोई विघ्न सताए।
खग दल की हो गुंज,श्याम को सखी रिझाए।।
'शुभम्' एक बिन एक,सदा ही रहता आधा।
मधुवन का थल नेक, श्याम से मिलतीं राधा।।
-3-
बाला ग्वाला सब चले, मधुवन को ले गाय।
चलो चराएँगे वहीं,उचित यही शुभ राय।।
उचित यही शुभ राय,करेंगे वन में क्रीड़ा।
खेलें - कूदें खूब, नहीं हो किंचित व्रीड़ा ।।
'शुभम्' कलेवा बाँध, फाँदते नाली - नाला।
जातीं मधुवन कुंज, चराने गायें बाला।।
-4-
मधुवन के तरुवर बड़े,कल्पवृक्ष के पुंज।
मधु वाले हैं सघन वन, सघन सजीले कुंज।।
सघन सजीले कुंज, वहीं पर रास रचाएँ।
जाते राधा श्याम , ग्वाल ग्वालिन बलाएँ।।
'शुभम्' पाँव में खूब,बजी पायल कर रुनझुन।
महक उठे तरु बेल, चहकता प्यारा मधुवन।।
-5-
मधुवन की महिमा बड़ी, सतयुग द्वापर आज।
राम श्याम ने हैं किए, बड़े-बड़े बहु काज।।
बड़े-बड़े बहु काज, मधुपुरी मधुरा न्यारी।
ग्वाल - बाल का साज, धन्य ब्रज के नर-नारी।।
'शुभम्' लताएँ वृक्ष, कर रहे क्रीड़ा बनठन।
देवी - देव स्वरूप, रूप निज बदले मधुवन।।
शुभमस्तु !
01.08.2025 ●4.00 आ०मा०
●●●
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें