शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

मधुवन [ कुण्डलिया ]

 386 /2025


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

राधा  मधुवन  को चलीं, अमराई की   छाँव।

कान्हा  जी भी त्यागते, नंदधाम निज   गाँव।।

नंदधाम  निज  गाँव,मिलन-आकांक्षा  भारी।

टिकें न भू  पर  पाँव, मिलें वृषभानु दुलारी।।

'शुभम्'  जहाँ  हो चाह,नहीं आती पथ  बाधा।

हृदय   करे  अवगाह,  त्वरा   में जातीं  राधा।।


                         -2-

राधा   का  वादा  यही, मिलना  मधुवन- कुंज।

आता  जाता  हो  नहीं,नर-नारी   जिस   पुंज।।

नर -नारी   जिस  पुंज, न  कोई विघ्न  सताए।

खग दल की हो गुंज,श्याम को सखी  रिझाए।।

'शुभम्'  एक  बिन एक,सदा ही रहता  आधा।

मधुवन का  थल  नेक, श्याम से मिलतीं राधा।।


                          -3-

बाला  ग्वाला सब चले, मधुवन को ले गाय।

चलो  चराएँगे   वहीं,उचित यही शुभ   राय।।

उचित  यही   शुभ  राय,करेंगे वन में   क्रीड़ा।

खेलें - कूदें   खूब,  नहीं  हो  किंचित  व्रीड़ा ।।

'शुभम्'  कलेवा  बाँध, फाँदते नाली - नाला।

जातीं  मधुवन   कुंज,  चराने   गायें  बाला।।


                         -4-

मधुवन   के  तरुवर  बड़े,कल्पवृक्ष के    पुंज।

मधु  वाले  हैं सघन वन, सघन सजीले  कुंज।।

सघन  सजीले   कुंज, वहीं  पर  रास   रचाएँ।

जाते   राधा   श्याम ,  ग्वाल ग्वालिन  बलाएँ।।

'शुभम्' पाँव में खूब,बजी पायल कर रुनझुन।

महक  उठे  तरु  बेल, चहकता प्यारा मधुवन।।


                         -5-

मधुवन की  महिमा बड़ी, सतयुग द्वापर  आज।

राम   श्याम   ने हैं  किए, बड़े-बड़े बहु    काज।।

बड़े-बड़े    बहु   काज, मधुपुरी  मधुरा   न्यारी।

ग्वाल - बाल  का साज, धन्य ब्रज के  नर-नारी।।

'शुभम्'   लताएँ   वृक्ष,  कर रहे क्रीड़ा  बनठन।

देवी - देव   स्वरूप, रूप निज बदले   मधुवन।।

शुभमस्तु !


01.08.2025 ●4.00 आ०मा०

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