शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

तेजपत्ता [ व्यंग्य ]

 479/2025



 ©व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 तेजपत्ता और उसके गुणों से भला कौन परिचित नहीं है।यह एक पत्ता होने के साथ -साथ तेज भी है। अपने चारु चरित्र से यह किसे मोहित नहीं करता।यह एक ऐसा विरक्त स्वभाव का सुगंधित और गुणकारी द्रव्य है,जो अपने कृतित्व की छाप छोड़कर अलग हो जाता है।इसे दाल, पुलाव, साँभर,करी, सूप,बिरयानी आदि में उनका स्वाद और सुगंध बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है। 

 जैसे कि आप जानते ही हैं कि मनुष्य एक अति स्वार्थी और आत्मकेंद्रित प्राणी है। वह अपना उल्लू सीधा करके अलग हो जाता है। इस मामले में तेजपत्ता एक ऐसा निदर्शन है ,जो मनुष्य की भयंकर स्वार्थवादी वृत्ति का शिकार है।वह विभिन्न खाद्य पदार्थो में उसे सुगन्ध और उसके गुणों के लाभ प्राप्त करने के बाद उससे सर्वथा विमुख ही नहीं हो जाता,वरन उसका तिरस्कार करते हुए उसे अपने संपर्क से भी च्युत कर देता है और महानता देखिए उस तेजपत्ते की कि वह अपनी सारी तेजी दिखाने के बाद विरक्त भाव से विदा हो जाता है।व्यक्तित्व हो तो ऐसा जैसा तेजपत्ता।न कोई लोभ लालच और न कोई उलाहना और न शिकायत ही।मौन भाव से विरक्ति का यह एक अनुपम उदाहरण है। 

 तेजपत्ते के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर मनुष्य ने बहुत कुछ सीखा है। वह भी किसी से अपना काम निकालकर तेजपत्ते की तरह अलग कर विमुख हो जाता है। इस दृष्टिकोण से तेजपत्ता उसका प्रेरक ही नहीं शिक्षक भी है।अपनी सुगन्ध बिखेरकर संबंधों से विरक्ति इसकी विशेषता है। इससे यह भी सबक मिलता है कि दुनिया स्वार्थ भरी है, यह केवल स्वाद और सुगंध से अपना काम निकाल कर उसे भूल जाती है। दूसरे शब्दों में इसे कृतघ्नता कहा जाता है। मनुष्य जैसे प्राणी के लिए यह अशोभनीय और निंदनीय भी है। 

 मानव की यह गुण ग्राहकता यह शिक्षा देती है कि 'सार-सार को गहि रखे थोथा देहि उड़ाइ।' तेजपत्ता का सारतत्त्व उसकी सुगंध और विविध प्रकार के औषधीय गुण हैं।यही उसका सार तत्त्व हैं,जिन्हें ग्रहण कर लिया जाता है और शेष पत्र को निस्सार मानकर फेंक दिया जाता है।मानव की उपयोगितावादी सोच और जीवन दृष्टि बहुत कुछ सीमा तक श्लाघनीय भले हो सकती है,किन्तु यह तिरस्कार और उत्क्षेपण सराहनीय कदापि नहीं है।

 इस असार संसार में कोई भी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज महत्त्वहीन नहीं है। यह तथ्य की बात तेजपत्ता प्रसंग से भलीभाँति विदित हो जाती है।तेजपत्ते को भी आदमी के इस व्यवहार ,जिसे सद व्यवहार तो कदापि नहीं माना जा सकता ;से अच्छा पाठ पढ़ने को मिल गया होगा। उसकी यह मानव के प्रति आसक्ति उसके जीवन की कोई सुघटना नहीं है। हाँ,सबक लेने की चीज अवश्य हो सकती है। 

 शुभमस्तु !

 29.08.2025●6.15 प०मा०

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