447/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
यदि मैं न होता
बहुत कुछ
बदला हुआ होता,
शांत सरोवर के सहारे
खड़ी रहतीं
वे अपने रूप को सँवारे
जुल्फ़ों के रंग काले
कैसे सुलझाएं
कैसे गुहाएँ।
कटोरे में भरे हुए तेल
कर रहा होता आदमी खेल
रूप को निहारता
मन ही मन रीझता
सिहाता
रूप की चाँदनी
निहारता बुहारता।
मेरे अभाव का विकल्प
खोजना ही पड़ता
मेरे बिना भी भला
काम कहाँ चलता!
मेरे अस्तिव से
आदमी औरत को
मिली है
बड़ी ही सफ़लता।
रंग हो या रूप हो
चाल अथवा ढाल
सबको दिखाने के लिए
सनद्ध हूँ हर क्षण हर काल
फिर भी कोई अहं नहीं
अभिमान नहीं
आज तो मैं
मिल ही जाता हूँ
हर कहीं,
कभी नहीं करता
नहीं-नहीं।
मैं एक दर्पण हूँ
किंतु पणता से
एकदम विमुख
विरक्त,
सच-सच दिखलाने के लिए
सदा ही आसक्त,
कोई बुरा माने
या माने भला,
सीखी नहीं है मैंने
भुलावे की
क्रीम पाउडरी कला।
शुभमस्तु !
21.08.2025● 12.45 प०मा०
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