गुरुवार, 7 अगस्त 2025

आदमी की भीड़ है [ नवगीत ]

 408/2025


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर जाओ

उधर जाओ

आदमी की भीड़ है।


बँट रहा राशन

लगतीं  कतारें

पहले मुझे का शोर है

बाजार की सड़कें भरीं

करतीं इशारे

लगता यही घुड़दौड़ है

अस्पतालों 

मंदिरों में देख लेना

आदमी ही भीड़ है।


कौन किसको 

पूछता है

कौन किसको जानता

सिर चमकते हैं

यहाँ पर

लक्ष्य को संधानता

गिर गया कोई

नहीं कोई उठाए

आदमी भी भीड़ है।


सघन बीहड़ 

आदमी का

ज्यों वनैले जीव हैं

चल रहा 

काँधे उठाए

व्यक्ति अपनी स्लीब है

पहचान लो

आदम सरीखी

आदमी - सी भीड़ है।


शुभमस्तु !


07.08.2025●9.45आ०मा०

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